FIFA World Cup 2026 : डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (कांगो डीआर) ने फुटबॉल के महाकुंभ में पूरे 52 साल लंबे इंतजार और सूखे को खत्म कर दिया है। 17 जून को पुर्तगाल के खिलाफ होने वाले मुकाबले से टीम अपने नए सफर का आगाज करेगी। इस बार कांगो की सबसे बड़ी कोशिश यही होगी कि वह अपने पुराने और कड़वे इतिहास को पीछे छोड़ दे।

साल 1974 के वर्ल्ड कप में ग्रुप स्टेज के शुरुआती मैचों में मिली करारी हार के बाद कांगो के खिलाड़ियों के लिए अपने ही वतन लौटने के रास्ते बंद होने की कगार पर पहुंच गए थे। अब यह अफ्रीकी टीम इस वर्ल्ड कप में अपनी पुरानी छवि को पूरी तरह से बदलने और दुनिया को यह दिखाने के इरादे से मैदान पर उतरेगी कि बीते दशकों में उनका फुटबॉल कितना परिपक्व और बदल चुका है।

1974 का वो खौफनाक सफर
साल 1974 के विश्व कप में कांगो डीआर (जिसे तब ‘जायरे’ के नाम से जाना जाता था) का सफर किसी बुरे सपने जैसा रहा था। स्वीडन से 2-0 से हारने के बाद टीम को यूगोस्लाविया के खिलाफ 9-0 की बेहद शर्मनाक और ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा। इस बेहद खराब प्रदर्शन से भड़के कांगो के क्रूर तानाशाह मोबुतु सेसे सेको ने खिलाड़ियों को सीधे शब्दों में चेतावनी दे डाली कि अगर वे अगले मैच में ब्राजील से तीन से अधिक गोल के अंतर से हारे, तो उन्हें देश में पैर नहीं रखने दिया जाएगा। ब्राजील जैसी दिग्गज टीम के सामने इस मानसिक दबाव के बावजूद खिलाड़ियों ने जी-जान लगा दी और ब्राजील को केवल 3 गोल पर ही रोक दिया। कांगो की टीम उस पूरे टूर्नामेंट में एक भी गोल नहीं कर सकी थी, लेकिन किसी तरह खिलाड़ी अपने देश वापस लौटने में कामयाब रहे।
संघर्षों से भरा रहा वापसी का रास्ता
कांगो डीआर के लिए फुटबॉल के इस सबसे बड़े मंच पर दोबारा कदम रखना बिल्कुल भी आसान नहीं था। यह देश पिछले कई दशकों से भयंकर राजनीतिक अस्थिरता, गृहयुद्ध और अंदरूनी संकटों से जूझ रहा है। मौजूदा समय में भी देश की लगभग 22 फीसदी आबादी गंभीर खाद्य संकट (भुखमरी) का सामना कर रही है। इन तमाम विपरीत परिस्थितियों का सीधा असर देश के खेल बुनियादी ढांचे और फुटबॉल पर भी पड़ा, जिससे टीम अपनी पूरी क्षमता के अनुसार प्रदर्शन नहीं कर पा रही थी। 1974 में पहला सब-सहारन अफ्रीकी देश बनकर इतिहास रचने वाली इस टीम को दोबारा उठने में आधी सदी लग गई। अब विपरीत हालातों से लड़कर ‘लेस लेपर्ड्स’ (तेंदुए) के नाम से मशहूर यह टीम एक बार फिर विश्व पटल पर दहाड़ने के लिए तैयार है।
कोच सेबेस्टियन देसबरे का चमत्कार
कांगो फुटबॉल के इस पुनर्जन्म के पीछे उनके मुख्य रणनीतिकार और मैनेजर सेबेस्टियन देसबरे का बहुत बड़ा हाथ है। साल 2022 में टीम की कमान संभालने के बाद देसबरे ने बिखरी हुई टीम को एकजुट किया और अफ्रीका कप ऑफ नेशंस 2023 में टीम को चौथे स्थान तक पहुंचाया। वर्ल्ड कप क्वालिफायर मुकाबलों में कांगो ने केमरून और नाइजीरिया जैसी दिग्गज और मजबूत अफ्रीकी टीमों को हराकर सबको चौंका दिया।
आखिरकार जमैका के खिलाफ खेले गए फीफा इंटर कॉन्फेडरेशन प्लेऑफ के बेहद रोमांचक मैच में, एक्स्ट्रा टाइम के 99वें मिनट में एक्सेल टाउनजेबे ने मैच का एकमात्र निर्णायक गोल दागकर कांगो डीआर को वर्ल्ड कप का टिकट दिला दिया। यह जीत देश के लिए इतनी ऐतिहासिक थी कि सरकार ने अगले दिन पूरे देश में राष्ट्रीय अवकाश (नेशनल हॉलीडे) की घोषणा कर दी थी।
टीम का गेम प्लान और मजबूत स्तंभ
मैनेजर देसबरे अपनी बेहतरीन टैक्टिकल सूझबूझ और रक्षात्मक नियंत्रण के लिए जाने जाते हैं। उनकी देखरेख में मजबूत डिफेंस ही इस टीम की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है, जिसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि टीम ने पिछले 13 वर्ल्ड कप क्वालिफायर मैचों में से 8 में क्लीन शीट हासिल की है। पिच पर टीम मुख्य रूप से 4-3-3 के फॉर्मेशन के साथ उतरती है, जो जरूरत पड़ने पर डिफेंड करते समय तुरंत बैक फाइव (5 सदस्यीय डिफेंस) में तब्दील हो जाता है।
टीम के कप्तान और भरोसेमंद डिफेंडर चैंसेल बेंबा, मिडफील्डर नवाह सिदीकी और स्टार स्ट्राइकर सेड्रिक बाकम्बु टीम की रीढ़ की हड्डी हैं। स्ट्राइकर बाकम्बु के पास वर्ल्ड कप इतिहास में अपने देश के लिए पहला गोल दागने का सुनहरा मौका होगा। हालांकि, कोच के लिए चिंता की बात यह है कि शुरुआती एकादश के 7 खिलाड़ी इस सीजन में अपने क्लबों के लिए नियमित रूप से नहीं खेल पाए हैं।
ग्रुप-के की कठिन चुनौती
ग्रुप स्टेज के अपने पहले ही मुकाबले में कांगो डीआर का सामना फुटबॉल की दुनिया के महानायक क्रिस्टियानो रोनाल्डो की पुर्तगाल टीम से होगा। 41 साल की उम्र में अपने करियर का आखिरी वर्ल्ड कप जीतने का सपना लेकर उतरने वाले रोनाल्डो और उनकी मजबूत टीम को रोकना कांगो के लिए एवरेस्ट फतह करने जैसा होगा। कांगो डीआर को ग्रुप-के में रखा गया है, जहां पुर्तगाल के अलावा कोलंबिया और उज्बेकिस्तान जैसी मजबूत टीमें शामिल हैं। पुर्तगाल और कोलंबिया की मजबूत मौजूदगी के कारण कांगो का सफर ग्रुप स्टेज में ही खत्म होने की भविष्यवाणियां की जा रही हैं। किसी बड़े चमत्कार के दम पर ही कांगो अगले दौर में पहुंच सकता है, क्योंकि पिछले कुछ सालों में उसने टॉप-20 टीमों में से सिर्फ सेनेगल और मोरक्को का सामना किया है और दोनों के खिलाफ उसका रिकॉर्ड निराशाजनक रहा है।
म्वेपु इलुंगा की वो ऐतिहासिक फ्री-किक
भले ही कांगो ने इतिहास में अब तक सिर्फ एक ही वर्ल्ड कप खेला हो, लेकिन 1974 के उस टूर्नामेंट की एक घटना फुटबॉल इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गई। ब्राजील के खिलाफ मैच के दौरान जब ब्राजील को एक बेहद खतरनाक पोजीशन पर फ्री-किक मिली, तो रेफरी की सीटी बजने से पहले ही कांगो के राइट बैक म्वेपु इलुंगा डिफेंसिव वॉल से दौड़ते हुए निकले और ब्राजीलियाई खिलाड़ियों के शॉट लेने से पहले ही गेंद को किक मारकर हवा में दूर उड़ा दिया।
पूरी दुनिया इस हरकत को देखकर दंग रह गई थी। असल में, यह तानाशाह मोबुतु के खिलाफ खिलाड़ियों का एक मूक विरोध (प्रोटेस्ट) था, जिसने मैच से ठीक पहले खिलाड़ियों की सैलरी और बोनस देने से मना कर दिया था। इलुंगा का मकसद गेंद को दूर फेंककर समय बर्बाद करना और रेड कार्ड पाकर बाहर होना था, हालांकि रेफरी ने उन्हें सिर्फ येलो कार्ड ही दिया। कांगो यह मैच 3-0 से हार गया, खिलाड़ी घर तो लौट सके लेकिन उन्हें उनके हक का पैसा कभी नहीं मिला।
सुपरफैन मिशेल कुका मबोलडिंगा
जैसे भारतीय क्रिकेट टीम के पास सचिन तेंदुलकर के सुपरफैन सुधीर चौधरी हैं, ठीक उसी तरह कांगो फुटबॉल टीम के पास उनके अपने सुपरफैन मिशेल कुका मबोलडिंगा हैं। अफ्रीका कप ऑफ नेशंस के दौरान मबोलडिंगा का अंदाज सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था। उनकी दीवानगी को देखते हुए खुद टीम के खिलाड़ियों की सिफारिश पर उन्हें कांगो के आधिकारिक विश्व कप प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया गया है। साल 2013 से मबोलडिंगा हर मैच में बेहद चमकीले और रंग-बिरंगे सूट पहनकर स्टेडियम पहुंचते हैं। वे पूरे 90 मिनट के खेल के दौरान अपना एक हाथ हवा में उठाए, कांगो के महान क्रांतिकारी नेता पैट्रिस लुमुम्बा की मूर्ति की तरह पूरी तरह शांत और अडिग खड़े रहकर अपनी टीम का हौसला बढ़ाते हैं।
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