DRDO Missile Test
DRDO Missile Test: भारतीय रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 11 जनवरी को महाराष्ट्र के अहिल्या नगर स्थित केके रेंज में मैन पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (MPATGM) का सफलतापूर्वक परीक्षण किया। यह परीक्षण भारतीय सेना की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया है, जो थल सेना की युद्धक क्षमता को कई गुना बढ़ा देगा। अत्याधुनिक तकनीक से लैस यह मिसाइल युद्ध के मैदान में दुश्मन के भारी-भरकम टैंकों को खिलौने की तरह तबाह करने में सक्षम है।
MPATGM की सबसे बड़ी विशेषता इसकी ‘फायर एंड फॉरगेट’ (Fire and Forget) तकनीक है। इसका अर्थ यह है कि एक बार सैनिक ने मिसाइल को लक्ष्य की ओर दाग दिया, तो उसे मिसाइल को गाइड करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह मिसाइल अपनी ‘स्मार्ट’ तकनीक के जरिए खुद ही दुश्मन के ठिकाने या टैंक को ढूंढती है और उसे नष्ट कर देती है। इससे युद्ध के दौरान सैनिकों की सुरक्षा बढ़ जाती है, क्योंकि वे मिसाइल दागने के तुरंत बाद अपनी पोजीशन बदलकर सुरक्षित स्थान पर जा सकते हैं।
इस मिसाइल की डिजाइन को बहुत सोच-समझकर तैयार किया गया है। इसका वजन बेहद कम है, जिससे एक अकेला सैनिक भी इसे आसानी से पीठ पर लादकर ऊँचे पहाड़ों या घने जंगलों में ले जा सकता है। इसे लॉन्च करने के लिए किसी भारी मशीनरी की जरूरत नहीं है; इसे एक छोटे ट्राइपॉड या किसी भी सैन्य वाहन से दागा जा सकता है। थर्मल इमेजिंग सिस्टम से लैस होने के कारण यह रात के अंधेरे या धुंध में भी दुश्मन के टैंक की गर्मी को पहचान लेती है और सटीक वार करती है।
तकनीकी रूप से यह मिसाइल ‘टॉप अटैक’ (Top Attack) मोड पर काम करती है। आमतौर पर टैंकों की सामने वाली बॉडी बहुत मजबूत होती है, लेकिन उनका ऊपरी हिस्सा अपेक्षाकृत पतला और कमजोर होता है। MPATGM टैंक के ठीक ऊपर से वार करती है, जिससे उसका बचना नामुमकिन हो जाता है। इसमें ‘टेंडेम वारहेड’ (Tandem Warhead) प्रणाली का उपयोग किया गया है, जिसमें दो विस्फोटक होते हैं। पहला विस्फोटक टैंक के सुरक्षा कवच (Reactive Armor) को तोड़ता है और दूसरा उसकी मुख्य बॉडी के परखच्चे उड़ा देता है।
इस मिसाइल का निर्माण पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से किया गया है। हैदराबाद स्थित डीआरडीओ की प्रयोगशाला DRDL ने इस सफल परीक्षण का नेतृत्व किया। परीक्षण के दौरान एक चलते हुए टैंक जैसा ‘थर्मल टारगेट’ बनाया गया था, जिसे मिसाइल ने पलक झपकते ही ध्वस्त कर दिया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफलता पर वैज्ञानिकों की टीम को बधाई दी और इसे ‘मेक इन इंडिया’ की एक शानदार मिसाल बताया। डीआरडीओ के चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत ने भी विश्वास जताया कि यह मिसाइल सेना की परिचालन क्षमता को नई मजबूती देगी।
सीमा पर जारी तनाव के बीच इस मिसाइल का सफल होना रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। विशेषकर पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में जहां दुश्मन के टैंक खतरा पैदा कर सकते हैं, वहां MPATGM एक अभेद्य दीवार की तरह काम करेगी। चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के बख्तरबंद बेड़ों के खिलाफ यह एक अचूक हथियार साबित होगा। भारत अब न केवल अपनी रक्षा जरूरतों के लिए स्वावलंबी हो रहा है, बल्कि भविष्य में ऐसी तकनीक का निर्यात कर वैश्विक रक्षा बाजार में भी अपनी धाक जमाने के लिए तैयार है।
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