Farooq Abdullah Leh violence: जम्मू-कश्मीर के लेह में हाल ही में हुई हिंसा ने एक बार फिर क्षेत्र की संवेदनशील स्थिति को उजागर कर दिया है। इस हिंसक घटना पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि यह प्रदर्शन किसी राजनीतिक साजिश का हिस्सा नहीं, बल्कि स्थानीय युवाओं की वर्षों की पीड़ा और असंतोष का नतीजा है।

14 दिनों की भूख हड़ताल से शुरू हुई समस्या
फारूक अब्दुल्ला ने बताया कि लेह में यह हिंसा उस वक्त भड़क उठी जब सोनम वांगचुक नामक एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता लगभग 14 दिनों से भूख हड़ताल पर थे। उनका मुख्य आरोप था कि लद्दाख को अभी तक छठी अनुसूची में सूचीबद्ध नहीं किया गया और राज्य का दर्जा नहीं मिला है। उन्होंने बताया कि सोनम वांगचुक और अन्य स्थानीय लोग पिछले पांच वर्षों से शांति से इस मांग के लिए आवाज़ उठा रहे थे। यहां तक कि उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए लेह से दिल्ली तक नंगे पैर पैदल यात्रा भी की थी, लेकिन उनकी मांगों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

युवाओं का असंतोष और हिंसा
फारूक अब्दुल्ला ने कहा,”युवाओं ने शायद सोचा होगा कि पांच साल पहले किए गए सारे वादे खोखले थे। परिणामस्वरूप, वे अपना असंतोष नहीं रोक पाए और हिंसा का रास्ता चुन लिया।”इस हिंसा में भाजपा कार्यालय, पुलिस वाहन, और कई अन्य सरकारी इमारतों को आग के हवाले कर दिया गया। इसके जवाब में पुलिस को बंदूकों का इस्तेमाल करना पड़ा। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस हिंसा में चार लोग मारे गए और 60 से 80 लोग घायल हुए हैं, जिनका इलाज जारी है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा
फारूक अब्दुल्ला ने इस घटना को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया। उन्होंने कहा,”यह एक सीमावर्ती राज्य है और चीन हमेशा से देश को अस्थिर करने की कोशिश करता रहा है। इस स्थिति को तुरंत सुलझाना होगा, बिना किसी और चिंगारी के।”
कोई साजिश नहीं, बल्कि स्थानीय आवाज़
नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि इस हिंसा के पीछे किसी राजनीतिक दल या साजिश का हाथ नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से स्थानीय लोगों की आवाज़ है, जिसे सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह जम्मू-कश्मीर में भी परिसीमन और चुनाव के बाद राज्य का दर्जा देने के वादे को पूरा करे।
लद्दाख से सबक लेने की जरूरत
फारूक अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार से कहा, “सरकार को लद्दाख से सीखना चाहिए। अगर वहां की जनता की आवाज़ नहीं सुनी गई, तो इसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ेगा। राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है।” लेह में हुई यह हिंसा केवल एक क्षेत्रीय समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता को प्रभावित करने वाली घटना है। फारूक अब्दुल्ला का बयान केंद्र और राज्य सरकार के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है कि स्थानीय लोगों की भावनाओं और मांगों को नजरअंदाज करना गंभीर परिणाम दे सकता है। सरकार को चाहिए कि वह त्वरित और संवेदनशील कदम उठाए ताकि लेह और लद्दाख क्षेत्र में शांति और विकास सुनिश्चित किया जा सके।











