Mahabharat : पिता के सम्मान में भीष्म का बलिदान, जानिए पूरी प्रेरक कहानी

Mahabharat : कहा जाता है कि माँ यदि हमारा प्रेम है, तो पिता उस घर की वह अडिग और मजबूत दीवार हैं, जो परिवार को हर धूप-छाँव से बचाती है। पिता की निस्वार्थ भावना अक्सर हमारी जरूरतों को बिना कहे समझ लेती है। यदि माँ के चरणों में स्वर्ग है, तो पिता को उस स्वर्ग तक पहुँचने की सीढ़ी माना गया है। पिता के इन्ही त्याग और बलिदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए हर वर्ष जून के तीसरे रविवार को ‘फादर्स डे’ मनाया जाता है। इस वर्ष 21 जून 2026 को पूरी दुनिया इस विशेष दिन को समर्पित कर रही है। पिता के त्याग की महिमा तो युगों-युगों से गाई जाती रही है, लेकिन द्वापर युग के एक पिता-पुत्र की कहानी आज भी हर किसी के हृदय को स्पर्श कर लेती है।

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महाराज शांतनु और सत्यवती की पहली मुलाकात

महाभारत काल की इस पौराणिक कथा के अनुसार, हस्तिनापुर के महाराज शांतनु एक बार शिकार के उद्देश्य से जंगल में गए थे। यमुना नदी के तट पर उनकी भेंट मत्स्यगंधा सत्यवती से हुई, जिन्हें देखते ही महाराज अपना हृदय हार बैठे। सत्यवती के प्रति अपने प्रेम को विवाह में बदलने के लिए महाराज शांतनु ने उनके पिता, निषादराज दशराज से भेंट की। राजा दशराज ने विवाह के लिए सहमति तो दी, लेकिन एक कठिन शर्त रख दी। उन्होंने कहा कि हस्तिनापुर के सिंहासन पर केवल सत्यवती की कोख से जन्मा पुत्र ही बैठेगा। महाराज शांतनु के लिए यह शर्त स्वीकार करना असंभव था, क्योंकि उनके ज्येष्ठ पुत्र देवव्रत पहले से ही युवराज और सिंहासन के उत्तराधिकारी थे।

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देवव्रत की भीष्म प्रतिज्ञा: पिता की खुशी के लिए किया बड़ा त्याग

हस्तिनापुर वापस लौटने के बाद महाराज शांतनु अत्यधिक दुखी रहने लगे। जब उनके पुत्र देवव्रत को इस मानसिक वेदना का कारण ज्ञात हुआ, तो वे स्वयं सत्यवती के पिता दशराज के पास पहुँचे। उन्होंने वहाँ अपने पिता के मान और उनकी खुशी के लिए वह भीषण प्रतिज्ञा की, जिसने इतिहास को बदल दिया। देवव्रत ने शपथ ली कि वे आजीवन हस्तिनापुर के सिंहासन पर नहीं बैठेंगे। इतना ही नहीं, भविष्य में भी उनकी कोई संतान दावेदारी न कर सके, इसके लिए उन्होंने ‘आजीवन ब्रह्मचर्य’ का कठोर व्रत धारण कर लिया। इसी महा-त्याग के कारण देवव्रत को ‘भीष्म’ नाम मिला और संसार में वे ‘भीष्म पितामह’ के नाम से विख्यात हुए।

पिता का आशीर्वाद और इच्छामृत्यु का वरदान

भीष्म द्वारा लिए गए इस संकल्प के बाद सत्यवती और महाराज शांतनु का विवाह संपन्न हुआ। भीष्म के इस त्याग से महाराज शांतनु इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने अपने पुत्र को ‘इच्छामृत्यु’ का अद्भुत वरदान दे दिया। इस वरदान के अनुसार, भीष्म पितामह तब तक जीवित रह सकते थे जब तक वे स्वयं न चाहें। यह कहानी हमें सिखाती है कि पिता-पुत्र का रिश्ता विश्वास और परस्पर सम्मान की नींव पर टिका होता है। जहाँ पिता ने अपने पुत्र के गुणों को पहचाना, वहीं पुत्र ने पिता की इच्छाओं को सर्वोपरि रखकर अपना जीवन समर्पित कर दिया। आज के फादर्स डे पर यह कथा हमें पिता के प्रति अपने कर्तव्यों और उनके प्रति गहरे सम्मान का स्मरण कराती है।

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Chandan Das

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