Indian Agriculture: भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है और आज भी देश की बड़ी आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है। हालांकि पिछले 50 वर्षों में कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिले हैं। जहां पहले देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी की आजीविका सीधे खेती पर आधारित थी, वहीं अब यह आंकड़ा घटकर करीब 45 से 50 प्रतिशत के बीच रह गया है। इसके पीछे औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और अन्य रोजगार के अवसरों का विस्तार प्रमुख कारण माना जाता है। इसके बावजूद कृषि आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी हुई है और करोड़ों परिवारों की आय का मुख्य स्रोत है।

हरित क्रांति से आधुनिक खेती तक का सफर
पिछले पांच दशकों में खेती का तरीका पूरी तरह बदल चुका है। हरित क्रांति के दौर में जहां उन्नत बीजों और सिंचाई सुविधाओं ने कृषि उत्पादन बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई, वहीं आज तकनीक ने खेती को पहले से कहीं अधिक आधुनिक बना दिया है। बैलों और हल से होने वाली खेती अब ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, सोलर पंप और आधुनिक कृषि उपकरणों तक पहुंच गई है। इसके साथ ही मोबाइल ऐप, डिजिटल सेवाएं और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म किसानों के लिए खेती को अधिक सुविधाजनक बना रहे हैं।

सिंचाई और तकनीक ने बढ़ाई उत्पादन क्षमता
पहले अधिकांश किसान मानसून और पारंपरिक जल स्रोतों जैसे कुओं पर निर्भर रहते थे। बारिश कम होने पर फसल खराब होने का खतरा बना रहता था। अब नहरों का विस्तार, ट्यूबवेल, स्प्रिंकलर और ड्रिप इरिगेशन जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों ने खेती को अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाया है। इसके अलावा हाइब्रिड बीज, उन्नत खाद और आधुनिक कृषि मशीनों के उपयोग से फसलों की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इससे किसानों को पहले की तुलना में अधिक उत्पादन प्राप्त होने लगा है।
खेती का दायरा हुआ व्यापक
समय के साथ किसानों ने केवल पारंपरिक खेती तक खुद को सीमित नहीं रखा। पहले जहां गेहूं, धान और कुछ चुनिंदा फसलें ही प्रमुख थीं, वहीं अब बागवानी, पॉलीहाउस खेती, फल-सब्जियों का उत्पादन, फूलों की खेती और व्यावसायिक कृषि तेजी से बढ़ रही है। कई किसान औषधीय पौधों और उच्च मूल्य वाली नकदी फसलों की ओर भी रुख कर रहे हैं। आधुनिक किसान मोबाइल के जरिए मंडी के ताजा भाव, मौसम की जानकारी और सरकारी योजनाओं की जानकारी लेकर बेहतर निर्णय लेने में सक्षम हो रहे हैं।
क्या बढ़ती तकनीक से किसानों की आय भी बढ़ी?
तकनीकी प्रगति और अधिक उत्पादन के बावजूद किसानों की आर्थिक स्थिति हर जगह समान रूप से मजबूत नहीं हुई है। उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ खेती की लागत भी लगातार बढ़ी है। बीज, उर्वरक, कीटनाशक, डीजल, बिजली और मजदूरी पर होने वाला खर्च पहले की तुलना में कई गुना अधिक हो चुका है। ऐसे में कुल उत्पादन बढ़ने के बावजूद शुद्ध लाभ में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई है। खासकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए बढ़ती लागत आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
छोटी जोत आज भी बड़ी चुनौती
देश में अधिकांश किसानों के पास सीमित कृषि भूमि है। लगातार बंटवारे के कारण खेतों का आकार छोटा होता गया है, जिससे आधुनिक खेती का पूरा लाभ सभी किसानों तक नहीं पहुंच पा रहा। कम जमीन पर अधिक मुनाफा कमाना आसान नहीं होता। ऐसे में छोटे किसानों को बाजार की कीमतों, मौसम और उत्पादन लागत जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यही कारण है कि तकनीकी विकास के बावजूद बड़ी संख्या में किसान आर्थिक दबाव झेल रहे हैं।
विविध खेती अपनाने वालों को मिला बेहतर लाभ
जिन किसानों ने पारंपरिक खेती के साथ डेयरी, पशुपालन, ऑर्गेनिक फार्मिंग, मधुमक्खी पालन या नकदी फसलों को अपनाया है, उनकी आय में अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि देखने को मिली है। कृषि के साथ अतिरिक्त आय के स्रोत जोड़ने से उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और जीवन स्तर में भी सुधार आया है। वहीं केवल पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने वाले कई किसानों को अभी भी सीमित आय में गुजारा करना पड़ रहा है।
आधुनिक खेती के बावजूद चुनौतियां बरकरार
पिछले 50 वर्षों में भारतीय कृषि ने लंबा सफर तय किया है। खेती अब पहले की तुलना में अधिक आधुनिक, तकनीक आधारित और उत्पादन क्षमता वाली बन चुकी है। बावजूद इसके यह कहना सही नहीं होगा कि हर किसान आर्थिक रूप से समृद्ध हो गया है। कुछ किसानों ने नई तकनीक और विविध खेती के जरिए अच्छी सफलता हासिल की है, जबकि कई किसान आज भी लागत, मौसम और बाजार की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं। ऐसे में कृषि क्षेत्र के सतत विकास के साथ किसानों की आय बढ़ाने और उनकी आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता बनी हुई है।
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