India Russia Relations : नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के बीच भारत और रूस के मजबूत रणनीतिक संबंधों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और महासचिव जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि भारत-रूस के मौजूदा रिश्तों की मजबूत नींव आज से नहीं, बल्कि कई दशक पहले रखी गई थी। उन्होंने कहा कि यह संबंध किसी एक सरकार या नेता की उपलब्धि नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही कूटनीतिक निरंतरता का परिणाम हैं।
कांग्रेस नेता ने सोवियत संघ के योगदान को याद किया
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक विस्तृत पोस्ट के जरिए भारत के विकास में पूर्ववर्ती सोवियत संघ के योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 1950 के दशक से भारत की विकास यात्रा में सोवियत संघ एक विश्वसनीय साझेदार रहा। उनके अनुसार, देश में शुरुआती इस्पात संयंत्रों, भारी इंजीनियरिंग परियोजनाओं, खनन और ऊर्जा क्षेत्र के विकास में सोवियत सहयोग महत्वपूर्ण रहा था।
रक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में भी मिला सोवियत सहयोग
कांग्रेस नेता ने अपने बयान में कहा कि सोवियत संघ की भूमिका केवल औद्योगिक विकास तक सीमित नहीं थी। तेल और गैस, रक्षा, अंतरिक्ष तथा परमाणु क्षेत्र जैसे रणनीतिक क्षेत्रों के निर्माण और विस्तार में भी दोनों देशों के बीच सहयोग रहा। उन्होंने इन उदाहरणों के जरिए यह बताने की कोशिश की कि भारत और रूस के संबंधों की बुनियाद आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक सहयोग के लंबे इतिहास पर आधारित है।
1955 में नेहरू और सोवियत नेताओं की ऐतिहासिक यात्राएं
जयराम रमेश ने भारत-रूस संबंधों के इतिहास का उल्लेख करते हुए वर्ष 1955 की घटनाओं को भी सामने रखा। उन्होंने बताया कि जुलाई 1955 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सोवियत संघ की 16 दिनों की यात्रा की थी। इसी वर्ष सोवियत नेताओं निकोलाई बुल्गानिन और निकिता ख्रुश्चेव ने भारत का 20 दिवसीय दौरा किया था। उन्होंने इन यात्राओं को द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत करने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल किया।
1971 की संधि ने रिश्तों को दी रणनीतिक मजबूती
कांग्रेस महासचिव ने कहा कि भारत और सोवियत संघ के बीच बढ़ते भरोसे का महत्वपूर्ण पड़ाव 9 अगस्त 1971 को सामने आया। इसी दिन दोनों देशों के बीच भारत-सोवियत शांति, मित्रता और सहयोग संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। जयराम रमेश के अनुसार, इस समझौते ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सोवियत संघ टूटने के बाद भी जारी रहा सहयोग
जयराम रमेश ने कहा कि वर्ष 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बावजूद भारत और रूस के संबंध कमजोर नहीं हुए। उनके मुताबिक, इसके बाद भी दोनों देशों ने रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाया। उन्होंने तत्कालीन रूसी प्रधानमंत्री येवगेनी प्रिमाकोव और बाद में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि इस रिश्ते को नए दौर में आगे बढ़ाया गया।
ब्रह्मोस परियोजना को बताया निरंतर सहयोग का उदाहरण
कांग्रेस नेता ने रक्षा क्षेत्र में भारत और रूस की साझेदारी का उदाहरण देते हुए ब्रह्मोस मिसाइल परियोजना का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह संयुक्त उद्यम पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में शुरू हुआ और बाद में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान भी इसका विस्तार जारी रहा। रमेश के मुताबिक, यह परियोजना दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा सहयोग की निरंतरता को दर्शाती है।
मोदी पर ऐतिहासिक उपलब्धियों का श्रेय लेने का आरोप
जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की विदेश नीति से जुड़ी ऐतिहासिक उपलब्धियों का श्रेय अपने नेतृत्व को देने की कोशिश करते हैं। उन्होंने कहा कि भारत-रूस संबंध कई दशकों के सामूहिक प्रयासों, अलग-अलग सरकारों की नीतियों और कूटनीतिक निरंतरता से मजबूत हुए हैं। उनके अनुसार, मौजूदा रणनीतिक साझेदारी को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक विकास और विभिन्न सरकारों के योगदान को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
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