India Pakistan partition: जब 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ, तब न सिर्फ़ एक राष्ट्र ने अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति पाई, बल्कि एक सभ्यता भी दो टुकड़ों में बंट गई।” 15 अगस्त 2025 को भारत अपनी आजादी की 78वीं वर्षगांठ मना रहा है, लेकिन यह दिन न केवल आज़ादी की खुशी, बल्कि बंटवारे के गहरे जख्मों की याद भी दिलाता है।

200 साल की गुलामी और अंग्रेजी नीतियों का खेल
भारत में ब्रिटिश शासन की शुरुआत 1757 की प्लासी की लड़ाई से मानी जाती है, जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल पर अधिकार कर लिया। 1857 की क्रांति के बाद कंपनी का शासन समाप्त हुआ और 1858 से 1947 तक भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन रहा। अंग्रेजों ने “फूट डालो और राज करो” की नीति को अपनाते हुए हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़ने का काम किया। यही नीति आगे चलकर भारत-पाकिस्तान के बंटवारे की नींव बनी।

बंटवारे का विचार और मुस्लिम लीग की भूमिका
19वीं सदी के अंत में जब भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने जोर पकड़ना शुरू किया, तब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) और मुस्लिम लीग जैसे संगठनों ने आज़ादी की मांग शुरू की। मोहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई में मुस्लिम लीग ने ‘दो राष्ट्र सिद्धांत’ को अपनाया, जिसमें कहा गया कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग राष्ट्र हैं और उन्हें अलग देश की आवश्यकता है। 1940 के लाहौर प्रस्ताव में पहली बार मुस्लिम लीग ने एक अलग राष्ट्र “पाकिस्तान” की आधिकारिक मांग की।
3 जून योजना और रैडक्लिफ लाइन का गठन
3 जून 1947 को भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत को दो राष्ट्रों – भारत और पाकिस्तान – में विभाजित करने की योजना पेश की। इसके लिए ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटिश वकील सर सिरिल रैडक्लिफ को भारत और पाकिस्तान की सीमाएं तय करने का ज़िम्मा सौंपा।
रैडक्लिफ को भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक जानकारी नहीं थी, और उन्हें सिर्फ 5 हफ्तों में सीमाएं तय करनी थीं। उन्होंने सीमाएं धर्म के आधार पर खींचीं, जिसे रैडक्लिफ लाइन कहा गया।
धार्मिक आधार पर बंटवारा: किन क्षेत्रों को मिला क्या?
पाकिस्तान में शामिल मुस्लिम-बहुल इलाके: पश्चिमी पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पूर्वी बंगाल। भारत में शामिल हिंदू-बहुल इलाके: शेष भारत और बंगाल तथा पंजाब के हिंदू बहुल भाग। रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का विकल्प दिया गया, जिससे कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ जैसे क्षेत्रों को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ।
बंटवारे की भयावहता और मानवीय संकट
बंटवारे के बाद 1.5 करोड़ लोग एक देश से दूसरे देश गए। हिंदू और सिख भारत आए, मुस्लिम पाकिस्तान चले गए। इस दौरान लाखों लोग मारे गए, खासकर पंजाब और बंगाल में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे और नरसंहार हुए।
कश्मीर विवाद की शुरुआत
जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह पहले स्वतंत्र रहना चाहते थे, लेकिन पाकिस्तानी कबायलियों के आक्रमण के बाद उन्होंने भारत में विलय कर लिया।
इस फैसले ने 1947-48 के पहले भारत-पाक युद्ध की नींव रखी और कश्मीर आज तक भारत-पाकिस्तान विवाद का केंद्र बना हुआ है।
क्यों हुआ बंटवारा? प्रमुख कारण
धार्मिक विभाजन – हिंदू-मुस्लिम के बीच बढ़ता अविश्वास।
अंग्रेजों की नीति – “Divide and Rule” की नीति ने समुदायों में तनाव बढ़ाया।
मुस्लिम लीग की मांग – दो राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर पाकिस्तान की मांग।
राजनीतिक असहमति – कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच साझा शासन पर सहमति न बन पाना।
ब्रिटिश साम्राज्य की कमजोरी – द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों ने भारत से जल्द निकलने की ठानी।
बंटवारे की जिम्मेदारियां किसके पास थीं?
लॉर्ड माउंटबेटन: अंतिम वायसराय, जिन्होंने विभाजन योजना तैयार की और आज़ादी की तारीख 15 अगस्त 1947 तय की।
सर सिरिल रैडक्लिफ: जिन्होंने सीमाएं तय कीं, लेकिन अनुभव और जानकारी के अभाव में गलतियां कीं।
जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और वीपी मेनन: भारत की ओर से रियासतों के विलय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।
मोहम्मद अली जिन्ना और लियाकत अली खान: पाकिस्तान के निर्माण के मुख्य चेहरे।
महात्मा गांधी: बंटवारे के खिलाफ थे, लेकिन उनकी भूमिका शांति स्थापित करने तक सीमित रही।
बंगाल और पंजाब बाउंड्री कमीशन
पंजाब बाउंड्री कमीशन:
मुस्लिम लीग: जस्टिस दिन मोहम्मद, जस्टिस मुहम्मद मुनीर
कांग्रेस: जस्टिस मेहर चंद महाजन, जस्टिस तेज सिंह
बंगाल बाउंड्री कमीशन:
मुस्लिम लीग: जस्टिस अबू सालेह मोहम्मद अकरम, जस्टिस शरीफुद्दीन अहमद
कांग्रेस: जस्टिस सुषिल चंद्र सेन, जस्टिस चमनलाल सेन
इन आयोगों में सहमति नहीं बनने पर रैडक्लिफ का निर्णय अंतिम माना गया।
आजादी का उत्सव और बंटवारे की सीख
15 अगस्त 1947 भारत के लिए जहां आजादी की सुबह थी, वहीं यह विभाजन की गहरी पीड़ा भी लेकर आई। लाखों लोग उजड़ गए, हजारों मारे गए, और कश्मीर जैसा विवाद आज तक जारी है।
इतिहास से हमें यह सीख मिलती है कि धार्मिक विभाजन और राजनीतिक असहमति अगर समय रहते न सुलझाई जाए, तो उसका परिणाम पीढ़ियों तक भुगतना पड़ता है।
आज जब भारत आजादी की 78वीं वर्षगांठ मना रहा है, यह जरूरी है कि हम आजादी की कीमत को समझें और सामाजिक सौहार्द, एकता और समरसता को बनाए रखें।










