UNSC Reform: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में लंबे समय से लंबित सुधार प्रक्रिया को लेकर भारत ने एक बार फिर तीखी प्रतिक्रिया दी है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने कहा कि 17 दौर की अंतर-सरकारी वार्ताओं (IGN) के बाद भी कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है। भारत का मानना है कि वैश्विक संस्थाओं में सुधार को कुछ देशों के संकीर्ण हितों के कारण लगातार टालना उचित नहीं है। भारत ने स्पष्ट किया कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधिक, पारदर्शी और प्रभावी बनाने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।

बातचीत फिर अगले सत्र तक टली
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 193 सदस्य देशों ने सुरक्षा परिषद सुधारों पर चल रही अंतर-सरकारी वार्ता को एक बार फिर अगले सत्र तक आगे बढ़ाने का फैसला किया है। यह प्रक्रिया कई वर्षों से हर साल आगे बढ़ती रही है, लेकिन अब तक किसी ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी है। अब यह मुद्दा सितंबर से शुरू होने वाले महासभा के 81वें सत्र में फिर से चर्चा के लिए रखा जाएगा। इस तरह सुरक्षा परिषद सुधार की प्रक्रिया अपने 18वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है।

भारत ने उठाया लंबी देरी का मुद्दा
भारत ने वार्ता को आगे बढ़ाने के प्रस्ताव का समर्थन तो किया, लेकिन लगातार हो रही देरी पर गंभीर चिंता भी जताई। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पार्वथनेनी हरीश ने कहा कि वर्षों से केवल चर्चा होती रही है, जबकि परिणाम कहीं दिखाई नहीं देते। उन्होंने भारतीय दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस प्रकार आत्मा मोक्ष प्राप्त करने से पहले कई जन्मों से गुजरती है, उसी तरह यह सुधार प्रक्रिया भी 17 चरणों से गुजर चुकी है, लेकिन अब तक किसी समाधान की झलक नहीं मिली है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर दुनिया और कितने समय तक इंतजार करेगी।
‘सिर्फ पुराने रुख दोहराए जा रहे हैं’
भारत ने कहा कि कई सदस्य देश हर बैठक में अपने पुराने रुख को ही दोहराते रहते हैं, जिससे सुधार प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है। भारत का मानना है कि यह रवैया संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता को प्रभावित कर रहा है। वैश्विक संघर्षों और सुरक्षा चुनौतियों के बीच सुरक्षा परिषद की प्रभावशीलता पर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में परिषद की संरचना में व्यापक बदलाव समय की जरूरत बन चुके हैं।
भारत ने सुझाया स्पष्ट समाधान
भारत ने जोर देकर कहा कि अब केवल चर्चा से आगे बढ़कर समयबद्ध और पाठ-आधारित (Text-Based) वार्ता शुरू की जानी चाहिए। भारत का मानना है कि सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों का विस्तार होना चाहिए, ताकि वर्तमान वैश्विक शक्ति संतुलन का बेहतर प्रतिनिधित्व हो सके। भारत विशेष रूप से विकासशील देशों और ‘ग्लोबल साउथ’ को अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग कर रहा है।
UNSC में भारत की दावेदारी लगातार मजबूत
भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का दावेदार रहा है। हाल ही में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वर्ष 2028-29 के कार्यकाल के लिए सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के चुनाव अभियान की शुरुआत की है। इस सीट के लिए अगले वर्ष होने वाले चुनाव में भारत का मुकाबला ताजिकिस्तान से होगा। भारत इससे पहले आठ बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रह चुका है और वैश्विक शांति एवं सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों में सक्रिय भूमिका निभा चुका है।
स्थायी सदस्यता पर भारत का स्पष्ट रुख
भारत का कहना है कि यदि केवल अस्थायी सीटों की संख्या बढ़ाई जाती है और स्थायी सदस्यता में कोई बदलाव नहीं होता, तो सुधार अधूरा माना जाएगा। भारत का तर्क है कि इससे मौजूदा पांच स्थायी सदस्यों की निर्णय लेने की शक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और प्रतिनिधित्व की समस्या जस की तस बनी रहेगी। इसलिए स्थायी सदस्यता का विस्तार किसी भी व्यापक सुधार का अहम हिस्सा होना चाहिए।
UfC समूह के प्रस्ताव का भारत ने किया विरोध
भारत ने ‘यूनाइटेड फॉर कंसेंसस’ (UfC) समूह के प्रस्ताव पर भी आपत्ति जताई है। इस समूह में पाकिस्तान, इटली, कनाडा और तुर्की जैसे देश शामिल हैं। यह समूह स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने के बजाय केवल अस्थायी सीटों का विस्तार करने का समर्थन करता है। भारत का मानना है कि ऐसा प्रस्ताव सुरक्षा परिषद को अधिक लोकतांत्रिक और संतुलित बनाने के उद्देश्य को पूरा नहीं करेगा। भारत ने दोहराया कि वास्तविक और प्रभावी सुधार तभी संभव हैं, जब परिषद की स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में व्यापक बदलाव किए जाएं।
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