Rewa hospital negligence: मध्य प्रदेश के रीवा स्थित संजय गांधी अस्पताल में इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला एक और मामला सामने आया है। 13 वर्षीय मनीष साहू, जो आसमानी बिजली की चपेट में आने के बाद झुलस गया था, डेढ़ महीने तक जिंदगी की जंग लड़ते हुए आखिरकार अस्पताल की बदइंतजामी और लापरवाह सिस्टम के आगे हार गया।

आसमानी बिजली से झुलसा, सिस्टम से जला
मनीष 30 सितंबर को बिजली गिरने से बुरी तरह झुलस गया था। पहले उसका इलाज महोबा और पन्ना में चला। हालत बिगड़ने पर डॉक्टरों ने उसे रीवा के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, संजय गांधी अस्पताल रेफर कर दिया। उम्मीद थी कि यहां उसे बेहतर और समय पर इलाज मिलेगा। लेकिन उसकी किस्मत और सिस्टम दोनों ने उसका साथ नहीं दिया।

इन तस्वीरों के लिये हम क्यों अभिशप्त हैं?? रीवा के संजय गांधी मेडिकल कॉलेज में दादी ड्रिप पकड़कर खड़ी रही, आरोप है 2 घंटे बाद पीड़ित को बेड मिला, बिजली गिरने से जला था हालात गंभीर थी बच्चे की मौत हो गई @GargiRawat @alok_pandey @manishndtv pic.twitter.com/xLp3FxsrlZ
— Anurag Dwary (@Anurag_Dwary) October 9, 2025
स्ट्रेचर पर तड़पता रहा मनीष, दादी पकड़े रहीं ड्रिप
रीवा अस्पताल पहुंचने के बाद मनीष को तत्काल इलाज नहीं मिल सका। उसकी बुजुर्ग दादी कांपते हाथों से ड्रिप की बोतल थामे उसे लेकर घंटों अस्पताल में भटकती रहीं। मनीष को कभी बर्न यूनिट, तो कभी इमरजेंसी वॉर्ड और फिर वॉर्ड नंबर 7 में भेजा गया। किसी ने भर्ती करने की जहमत नहीं उठाई। दो घंटे तक इलाज शुरू ही नहीं हुआ।
इलाज में देरी ने ली जान
स्ट्रेचर पर पड़ा मनीष दर्द से कराहता रहा और दादी मदद के लिए गुहार लगाती रहीं, लेकिन किसी का दिल नहीं पसीजा। अस्पताल की इंटरनल रिपोर्ट में भी यह बात मानी गई है कि विभागों के बीच समन्वय की कमी के कारण इलाज शुरू करने में 2 घंटे की देरी हुई, जो बच्चे की जान पर भारी पड़ी।

प्रशासन का असंवेदनशील रवैया
घटना के बाद जब सवाल उठे तो अस्पताल सुपरिंटेंडेंट डॉ. राहुल मिश्रा ने कहा, “ऐसे मरीज तो रोज आते हैं। इतने बड़े अस्पताल में इलाज में थोड़ा वक्त लग ही जाता है।” उनका यह बयान सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की असंवेदनशीलता को उजागर करता है।बाल रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. बजाज ने भी पुष्टि की कि मनीष की हालत बेहद गंभीर थी और तमाम कोशिशों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका।
डिप्टी सीएम के शहर का हाल बेहाल
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह घटना उस अस्पताल में हुई, जो मध्य प्रदेश के डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला के निर्वाचन क्षेत्र में स्थित है। इसके बावजूद अस्पताल की व्यवस्थाएं इतनी लचर और अमानवीय बनी हुई हैं। मनीष की मौत सिर्फ एक मासूम की मौत नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता और सरकारी अस्पतालों की बदहाल स्थिति की सच्चाई है। अगर वक्त पर इलाज मिलता, तो शायद उसकी जान बच सकती थी। यह घटना सिर्फ रीवा ही नहीं, पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवालिया निशान है।











