अंतरराष्ट्रीय

Iran-US Nuclear Talks : ईरान-अमेरिका परमाणु वार्ता विफल, ट्रंप की युद्ध की चेतावनी, कतर की बैकडोर एंट्री से हलचल

Iran-US Nuclear Talks :  ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु समझौते को लेकर चल रही खींचतान अब एक गंभीर मोड़ पर पहुंच गई है। समझौते की राह में आ रही बाधाओं के कारण मौजूदा सीजफायर (युद्धविराम) पर संकट के बादल गहराने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि जल्द ही कोई ठोस सहमति नहीं बनती है, तो सीजफायर को खत्म किया जा सकता है। सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन एक बार फिर सैन्य कार्रवाई और युद्ध शुरू करने के विकल्पों पर विचार कर रहा है। दूसरी ओर, ईरान ने शांति की अपील करते हुए कहा है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है और अमेरिका को उनके द्वारा दिए गए प्रस्तावों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

कतर बना संकटमोचक: बैकडोर डिप्लोमेसी के जरिए डील की कोशिश

तनावपूर्ण माहौल के बीच अमेरिका ने कूटनीतिक रास्तों का सहारा लेते हुए कतर को ‘बैकडोर चैनल’ के रूप में सक्रिय किया है। कतर को अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने और जटिल सौदों को अंजाम देने में विशेषज्ञ माना जाता है। अमेरिका ने कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान अल-थानी को इस पूरी प्रक्रिया में शामिल किया है। उम्मीद की जा रही है कि कतर की मध्यस्थता तेहरान और वॉशिंगटन के बीच जमी बर्फ को पिघलाने में कारगर साबित हो सकती है, जिससे क्षेत्र में फिर से छिड़ने वाले संभावित युद्ध को टाला जा सके।

भरोसे की कमी और गारंटी की मांग: ईरान की कड़ी शर्तें

समझौते की राह में सबसे बड़ा रोड़ा दोनों देशों के बीच गहराता अविश्वास है। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बगेर गालिबफ का मानना है कि तेहरान के लिए अमेरिका पर भरोसा करना असंभव है। चीन में ईरान के राजदूत ने एक महत्वपूर्ण शर्त रखते हुए कहा है कि यदि कोई वैश्विक महाशक्ति इस बात की लिखित गारंटी देती है कि भविष्य में अमेरिका ईरान पर हमला नहीं करेगा, तभी वे समझौते की मेज पर आगे बढ़ेंगे। ईरान अपनी सुरक्षा को लेकर एक मजबूत ‘गारंटर’ चाहता है, जिसके बिना वह किसी भी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने को तैयार नहीं है।

यूरेनियम संवर्धन और संप्रभुता का सवाल: ठिकानों को बचाने की जिद

ईरान ने अपने परमाणु ठिकानों को नष्ट करने की अमेरिकी शर्त को सिरे से खारिज कर दिया है। ईरानी सरकार के प्रवक्ता के अनुसार, कोई भी समझौता अमेरिका की एकतरफा शर्तों पर नहीं होगा। ईरान ने यूरेनियम संवर्धन की प्रक्रिया को रोकने का प्रस्ताव तो दिया है, लेकिन वह अपने परमाणु बुनियादी ढांचे को ध्वस्त नहीं करेगा। तेहरान इन ठिकानों को अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता का प्रतीक मानता है। इसके अलावा, अमेरिका जहां 20 साल के प्रतिबंधों पर अड़ा है, वहीं ईरान केवल 10 साल की समय सीमा के लिए तैयार है।

200 अरब डॉलर का हर्जाना: ईरान की बड़ी आर्थिक मांग

परमाणु शर्तों के अलावा, ईरान ने अमेरिका के सामने एक भारी-भरकम आर्थिक मांग भी रखी है। ईरान का कहना है कि पिछले वर्षों में अमेरिका ने उसके ठिकानों पर जो हमले किए हैं और जो आर्थिक नुकसान पहुंचाया है, उसके हर्जाने के रूप में उसे कम से कम 200 अरब डॉलर की क्षतिपूर्ति राशि दी जाए। यह मांग अमेरिका के लिए गले की फांस बनी हुई है, क्योंकि वॉशिंगटन इसे स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है। इन शर्तों के टकराव ने वार्ता को एक ऐसे मुकाम पर खड़ा कर दिया है जहां से वापसी मुश्किल लग रही है।

ट्रंप का ‘पागलपन’ वाला बयान और जॉन बॉल्टन की सैन्य चेतावनी

राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व की आलोचना करते हुए उन्हें ‘पागल’ करार दिया है। ट्रंप का कहना है कि ईरान के उदारवादी और कट्टरपंथी गुट अलग-अलग बातें कर रहे हैं, जिससे तालमेल बिठाना कठिन है। ट्रंप का एकमात्र लक्ष्य ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना है। वहीं, पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बॉल्टन ने चेतावनी दी है कि ईरान के कट्टरपंथी किसी भी ऐसी डील के पक्ष में नहीं हैं जिसे ट्रंप अपनी जीत के रूप में पेश कर सकें। बॉल्टन के अनुसार, ऐसी स्थिति में ट्रंप के पास ईरान पर सैन्य हमला करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा।

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