Ambubachi Mela : असम के गुवाहाटी में नीलांचल पर्वत की चोटियों पर स्थित कामाख्या देवी का मंदिर न केवल भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है, बल्कि यह तंत्र साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा का सबसे बड़ा केंद्र भी माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव देवी सती के पार्थिव शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण कर रहे थे, तब विष्णु जी के सुदर्शन चक्र से सती के अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरे थे। मान्यता है कि कामाख्या में देवी सती का ‘योनि भाग’ गिरा था, जिसके कारण यह स्थान अत्यंत पवित्र और शक्ति-संपन्न माना जाता है। यह मंदिर अपनी अनूठी मान्यताओं और रहस्यों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है, जहाँ साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है।

अंबुबाची मेला: जब तीन दिनों के लिए बंद हो जाते हैं कपाट
कामाख्या मंदिर में ‘अंबुबाची मेला’ का विशेष महत्व है, जो पूर्वी भारत के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, हर वर्ष जून महीने में देवी कामाख्या रजस्वला होती हैं, जिसे मासिक धर्म का काल माना जाता है। इस दौरान मंदिर के कपाट तीन दिनों के लिए पूर्णतः बंद कर दिए जाते हैं और सभी प्रकार की पूजा-अर्चना व दर्शन रोक दिए जाते हैं। इस वर्ष, 22 जून की रात से अंबुबाची मेले की शुरुआत हो रही है। इन तीन दिनों की अवधि के बाद, 26 जून की सुबह नित्य पूजा के साथ मंदिर के कपाट फिर से भक्तों के लिए खोल दिए जाएंगे। यह एक दुर्लभ परंपरा है जो कामाख्या को अन्य देवी मंदिरों से अलग बनाती है।

योनि आकार की शिला: गर्भ गृह का अद्भुत रहस्य
कामाख्या मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके गर्भ गृह में देवी की कोई पारंपरिक प्रतिमा नहीं है। इसके बजाय, यहाँ एक ‘योनि के आकार की शिला’ स्थित है, जिसे योनिकुंड कहा जाता है। भक्त सीढ़ियों से नीचे एक अंधेरी और गहरी गुफा में जाकर इस शिला के दर्शन करते हैं, जहाँ से निरंतर जल की धारा बहती रहती है। श्रद्धालु इसी शिला और जल को स्पर्श कर मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह स्थान साधकों के लिए तंत्र-मंत्र की सिद्धि का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहाँ दुनिया भर से तांत्रिक और साधु अपनी साधना के लिए आते हैं।
ब्रह्मपुत्र का लाल जल और ‘अंबुबाची वस्त्र’ का प्रसाद
अंबुबाची के दौरान यहाँ प्रकृति भी एक रहस्यमयी व्यवहार करती है। मान्यता है कि देवी के रजस्वला होने के इन तीन दिनों में मंदिर के पास बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल हो जाता है। इस अवधि में गर्भ गृह के कुंड के पास सफेद सूती वस्त्र बिछा दिए जाते हैं। तीन दिनों बाद जब मंदिर के कपाट खोले जाते हैं, तो ये वस्त्र देवी के रक्त से लाल हो जाते हैं। इन वस्त्रों को ‘अंबुबाची वस्त्र’ या ‘अंगोदक वस्त्र’ कहा जाता है, जिन्हें प्रसाद के रूप में भक्तों को वितरित किया जाता है। यह प्रसाद इस मंदिर की सबसे बड़ी शक्ति और भक्ति का प्रतीक माना जाता है।
रहस्यमयी परंपराओं का संगम: कामाख्या देवी की महिमा
कामाख्या देवी मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह स्त्रीत्व और सृजन की शक्ति का प्रतीक भी है। मंदिर में होने वाली ये अलौकिक घटनाएं विज्ञान और तर्क की सीमाओं से परे हैं, जो भक्तों के मन में देवी के प्रति श्रद्धा और विस्मय को और गहरा कर देती हैं। तीन दिनों तक मंदिर का बंद होना और फिर चौथे दिन पूरी ऊर्जा के साथ भक्तों का उमड़ना, कामाख्या मंदिर की जीवंतता को दर्शाता है। अंबुबाची मेला केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि स्वयं को शक्ति के उस परम स्रोत से जोड़ने का एक आध्यात्मिक अवसर है।
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