Karnataka Politics
Karnataka Politics: कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। राज्य में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के भीतर लंबे समय से सुलग रहा असंतोष अब खुलकर सामने आ गया है। लगभग 30 वरिष्ठ विधायकों के एक गुट ने अपनी मांगों को लेकर देश की राजधानी दिल्ली में दस्तक दी है। इन विधायकों का मुख्य उद्देश्य पार्टी आलाकमान, विशेषकर राहुल गांधी और राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से मुलाकात कर राज्य मंत्रिमंडल में बड़े पैमाने पर फेरबदल करने के लिए दबाव बनाना है। विधायकों का मानना है कि सरकार के आधे कार्यकाल के बाद अब नए चेहरों को जिम्मेदारी सौंपने का समय आ गया है।
दिल्ली पहुंचे इस विद्रोही गुट का नेतृत्व बेलूर गोपालकृष्ण और अशोक पट्टन जैसे कद्दावर नेता कर रहे हैं। इन विधायकों का तर्क सीधा और स्पष्ट है: पार्टी में सत्ता का विकेंद्रीकरण होना चाहिए। उनका कहना है कि कर्नाटक सरकार में वर्तमान में कई ऐसे मंत्री शामिल हैं जो पिछले कई दशकों से सत्ता के गलियारों में बने हुए हैं और तीन से पांच बार मंत्री पद का सुख भोग चुके हैं। ऐसे में उन निष्ठावान और वरिष्ठ विधायकों में भारी निराशा है, जो वर्षों से अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। विधायकों का कहना है कि ‘अनुभव’ के नाम पर कुछ ही चेहरों का दबदबा रहने से संगठन में ऊर्जा की कमी हो रही है।
विधायक बेलूर गोपालकृष्ण ने मीडिया से बात करते हुए स्पष्ट किया कि उनका मकसद किसी का विरोध करना नहीं, बल्कि आलाकमान को जमीनी हकीकत से रूबरू कराना है। उन्होंने कहा, ‘हम नेतृत्व से अनुरोध करेंगे कि जो नेता बार-बार कैबिनेट का हिस्सा बन रहे हैं, उन्हें अब संगठन के काम में लगाया जाए और कतार में खड़े नए और ऊर्जावान विधायकों को प्रशासन का हिस्सा बनने का अवसर दिया जाए।’ विधायकों की मांग है कि मंत्रिमंडल की कम से कम 25 सीटों पर व्यापक बदलाव किया जाए ताकि असंतोष को कम किया जा सके और आगामी चुनावों के लिए एक नई टीम तैयार की जा सके।
इस दिल्ली दौरे की नींव अचानक नहीं पड़ी है, बल्कि इसकी योजना इसी साल मार्च में आयोजित एक ‘डिनर मीटिंग’ के दौरान ही तैयार कर ली गई थी। विधायकों के अनुसार, जब कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनी थी, तब मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने यह संकेत दिया था कि दो साल का कार्यकाल पूरा होने पर कैबिनेट में बड़े बदलाव किए जाएंगे। अब सरकार के तीन साल पूरे होने को हैं, लेकिन कैबिनेट में किसी भी तरह के बदलाव की कोई सुगबुगाहट न देख विधायकों का सब्र टूट गया है। हालिया उपचुनावों के सकारात्मक नतीजों ने इन विधायकों को अपनी आवाज बुलंद करने का हौसला दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने बहुत ही सधे हुए अंदाज में प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर लिखते हुए विधायकों के दिल्ली दौरे को सामान्य बताया। मुख्यमंत्री ने कहा कि मंत्री पद की आकांक्षा रखने वाले नेताओं का आलाकमान से मिलना लोकतंत्र का हिस्सा है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। उन्होंने फेरबदल में हो रही देरी का बचाव करते हुए तर्क दिया कि पांच राज्यों के चुनाव और हालिया बजट सत्र की व्यस्तताओं के कारण इस प्रक्रिया में समय लग रहा है। हालांकि, 30 विधायकों की एकजुटता सीएम के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती मानी जा रही है।
फिलहाल, गेंद मल्लिकार्जुन खरगे, के.सी. वेणुगोपाल और राहुल गांधी के पाले में है। दिल्ली पहुंचे विधायक रणदीप सुरजेवाला और अन्य वरिष्ठ नेताओं से संपर्क साधने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि विधायकों ने इसे ‘बगावत’ के बजाय ‘सामूहिक नेतृत्व’ का नाम दिया है, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में विधायकों का दिल्ली में जमावड़ा होना यह दर्शाता है कि कर्नाटक कांग्रेस के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। अब देखना यह होगा कि आलाकमान इन असंतुष्ट विधायकों को कैबिनेट में जगह देकर शांत करता है या फिर मौजूदा मंत्रियों पर ही भरोसा कायम रखता है।
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