Karnataka caste survey: कर्नाटक में आगामी सामाजिक-आर्थिक और जातिगत सर्वेक्षण से पहले राज्य की राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है। लिंगायत समुदाय की शीर्ष संस्था “अखिल भारतीय वीरशैव-लिंगायत महासभा” ने समुदाय के लोगों से अपील की है कि वे खुद को “वीरशैव-लिंगायत” के रूप में दर्ज करवाएं, न कि हिंदू धर्म के अंतर्गत। इस अपील ने न सिर्फ सर्वेक्षण प्रक्रिया को संवेदनशील बना दिया है, बल्कि राज्य की राजनीतिक फिजा में भी हलचल मचा दी है।

क्या है पूरा मामला?
राज्य में 22 सितंबर 2025 से शुरू होने वाले जातिगत गणना अभियान से पहले लिंगायत समुदाय ने अपनी पहचान को लेकर अलग रुख अपनाया है। महासभा का कहना है कि लिंगायत एक अलग धर्म है और इसे हिंदू धर्म से अलग दर्जा मिलना चाहिए। समुदाय की यह मांग लंबे समय से चली आ रही है, लेकिन आगामी सर्वेक्षण को देखते हुए यह मुद्दा फिर से गरमा गया है।

बीजेपी को हो सकता है बड़ा नुकसान
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए यह स्थिति राजनीतिक चुनौती बन सकती है। राज्य में लिंगायत समुदाय को परंपरागत रूप से बीजेपी का कोर वोट बैंक माना जाता रहा है। यदि सर्वेक्षण में बड़ी संख्या में लिंगायत स्वयं को हिंदू की बजाय वीरशैव-लिंगायत के रूप में दर्ज कराते हैं, तो इससे बीजेपी के हिंदू वोट बैंक में विभाजन की स्थिति बन सकती है।
आंकड़ों को लेकर भी विवाद
महासभा और लिंगायत नेताओं का दावा है कि पिछली बार के सर्वेक्षण में उनकी आबादी को कमतर दर्शाया गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, लिंगायतों की संख्या 11% बताई गई थी, जो कि एससी (18%) और मुस्लिम (13%) जनसंख्या से कम है। जबकि लिंगायत नेता 17% से अधिक हिस्सेदारी का दावा करते रहे हैं।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एमबी पाटिल और लक्ष्मी हेबलकर जैसे लिंगायत नेता पहले भी इन आंकड़ों पर आपत्ति जता चुके हैं। उनका कहना है कि सही आंकड़ों के बिना सामाजिक न्याय और राजनीतिक भागीदारी की नीति अधूरी रह जाएगी।
क्यों खास है ये सर्वे?
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और कांग्रेस नेतृत्व के निर्देश पर शुरू हो रहा यह जातिगत सर्वे, कर्नाटक की राजनीतिक-सामाजिक संरचना को फिर से परिभाषित कर सकता है। इस सर्वे को तीन महीनों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है और इसके नतीजे आगामी चुनावी रणनीतियों को सीधे प्रभावित कर सकते हैं।
लिंगायत समुदाय द्वारा अपनी पहचान को लेकर उठाई गई मांग से साफ है कि कर्नाटक में जाति और धर्म आधारित राजनीति आने वाले समय में और तेज़ होने वाली है। यह केवल एक धार्मिक पहचान की लड़ाई नहीं, बल्कि सत्ता, प्रतिनिधित्व और संसाधनों के बंटवारे की गहराई से जुड़ा मुद्दा है।










