Soil Nitrogen: बारिश खेती के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है, लेकिन लगातार तेज बारिश और खेत में लंबे समय तक पानी जमा रहने से फसलों को नुकसान हो सकता है। इसका असर मिट्टी में मौजूद नाइट्रोजन पर भी पड़ता है। खासकर उन खेतों में खतरा अधिक रहता है, जहां बारिश से पहले नाइट्रोजन युक्त उर्वरक डाला गया हो। पानी भरने की स्थिति में नाइट्रोजन मुख्य रूप से लीचिंग और डिनाइट्रीफिकेशन के जरिए कम हो सकती है।

लीचिंग से नाइट्रेट नीचे पहुंचता है
जब खेत में बारिश का पानी तेजी से मिट्टी के भीतर जाता है, तो उसमें मौजूद नाइट्रेट भी मिट्टी की निचली परतों तक पहुंच सकता है। इस प्रक्रिया को लीचिंग कहा जाता है। हल्की या रेतीली मिट्टी में पानी आसानी से नीचे जाने के कारण नाइट्रोजन के लीचिंग का खतरा अपेक्षाकृत ज्यादा रहता है। इससे पौधों को उपलब्ध नाइट्रोजन की मात्रा घट सकती है।

पानी भरने से डिनाइट्रीफिकेशन बढ़ता है
भारी मिट्टी में लंबे समय तक पानी जमा रहने की स्थिति अलग होती है। लगातार जलभराव से मिट्टी के भीतर ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। ऐसे वातावरण में मौजूद सूक्ष्मजीव नाइट्रेट को गैसीय रूप में बदलने लगते हैं। यह गैस धीरे-धीरे मिट्टी से बाहर निकलकर वातावरण में चली जाती है। इसे डिनाइट्रीफिकेशन कहा जाता है। पानी जितने लंबे समय तक जमा रहेगा, नाइट्रोजन नुकसान का जोखिम उतना बढ़ सकता है।
जलभराव की अवधि से समझें नुकसान
कुछ आंकड़ों के अनुसार, लगभग 55 से 60 डिग्री फारेनहाइट तापमान वाली मिट्टी में यदि करीब पांच दिनों तक जलभराव बना रहे, तो लगभग 10 प्रतिशत तक नाइट्रोजन नुकसान हो सकता है। वहीं, पानी करीब 10 दिनों तक जमा रहने पर यह नुकसान लगभग 25 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। गर्म मिट्टी में नाइट्रोजन का नुकसान और तेजी से बढ़ने की संभावना रहती है।
हर खेत में नाइट्रोजन की कमी समान नहीं
बारिश के बाद सभी खेतों में नाइट्रोजन की कमी एक जैसी नहीं होती। इसका असर कई परिस्थितियों पर निर्भर करता है। खाद कितनी मात्रा में डाली गई थी, बारिश से कितने समय पहले उर्वरक का इस्तेमाल हुआ था और खेत में पानी कितने समय तक जमा रहा, ये सभी बातें महत्वपूर्ण हैं। इसलिए केवल बारिश होने के आधार पर अतिरिक्त नाइट्रोजन डालना उचित नहीं माना जा सकता।

मिट्टी की प्रकृति भी करती है असर
नाइट्रोजन नुकसान का संबंध मिट्टी की बनावट से भी होता है। रेतीली मिट्टी में पानी तेजी से नीचे जाने के कारण नाइट्रेट लीचिंग का खतरा अधिक हो सकता है। दूसरी ओर, भारी मिट्टी में जलभराव लंबे समय तक रहने पर डिनाइट्रीफिकेशन की प्रक्रिया बढ़ सकती है। एक ही खेत के अलग-अलग हिस्सों में भी पानी जमा होने की स्थिति अलग हो सकती है। इसलिए पूरे खेत के लिए एक जैसा फैसला लेना सही नहीं है।
पीली पत्तियां देखकर तुरंत खाद न डालें
बारिश के बाद फसल की पत्तियां पीली दिखाई दें तो इसे तुरंत नाइट्रोजन की कमी नहीं मानना चाहिए। ज्यादा पानी जमा होने से पौधों की जड़ों की गतिविधि प्रभावित हो सकती है। इससे कुछ समय के लिए पौधे मिट्टी से पोषक तत्व कम मात्रा में ले पाते हैं और पत्तियां पीली पड़ सकती हैं। यदि मिट्टी सूखने के बाद जड़ें सामान्य रूप से काम करने लगें, तो पौधों की स्थिति अपने आप सुधर सकती है।
बारिश के बाद किसान पहले खेत की स्थिति देखें
बारिश रुकने के तुरंत बाद खेत में यूरिया या अतिरिक्त नाइट्रोजन डालने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। किसान सबसे पहले यह देखें कि खेत में पानी कितने समय तक जमा रहा, फसल की वर्तमान स्थिति कैसी है और मिट्टी सूखने के बाद पौधों में नई बढ़त दिखाई दे रही है या नहीं। यदि फसल धीरे-धीरे सामान्य हो रही है, तो कुछ समय इंतजार करना बेहतर हो सकता है।
जरूरत होने पर ही अतिरिक्त नाइट्रोजन दें
यदि खेत में लंबे समय तक जलभराव रहा है और उपलब्ध नाइट्रोजन के नुकसान की पर्याप्त संभावना दिखाई दे रही है, तभी अतिरिक्त नाइट्रोजन देने पर विचार किया जाना चाहिए। सही समय पर सीमित मात्रा में नाइट्रोजन का इस्तेमाल जलभराव से प्रभावित फसल की उत्पादकता बचाने में मदद कर सकता है। हालांकि, खाद की मात्रा खेत की स्थिति, मिट्टी की प्रकृति, फसल और पहले इस्तेमाल किए गए उर्वरक के आधार पर तय करनी चाहिए।
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