Delimitation Bill
Delimitation Bill : भारतीय संसदीय इतिहास में गुरुवार का दिन महिला सशक्तिकरण के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। संसद के विस्तारित बजट अधिवेशन की तीन दिवसीय विशेष बैठक के पहले ही दिन सरकार ने महिला आरक्षण से जुड़े तीन प्रमुख विधेयक लोकसभा के पटल पर रखे। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही विधायी प्रक्रियाओं को तेजी से आगे बढ़ाया गया। इन विधेयकों का मुख्य उद्देश्य लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करना है। आवश्यक औपचारिकताओं के बाद, इन विधेयकों पर संयुक्त चर्चा शुरू हो गई है, जो भारतीय राजनीति की भविष्य की दिशा तय करेगी।
गुरुवार पूर्वाह्न 11 बजे जैसे ही सदन की कार्यवाही प्रारंभ हुई, विधि एवं न्याय राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने ‘संविधान (131वां संशोधन) विधेयक-2026’ और ‘परिसीमन विधेयक-2026’ पेश करने का प्रस्ताव रखा। इसी क्रम में गृहमंत्री अमित शाह ने ‘केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक-2026’ सदन के सामने रखा। इन विधेयकों को पेश करने की प्रक्रिया के दौरान ही सदन में तीखी बहस देखने को मिली। प्रस्तावों पर हुए मतदान में 251 सदस्यों ने समर्थन किया, जबकि 185 सदस्यों ने विरोध में मत डाला। नियमों के अनुसार, संविधान संशोधन विधेयक पेश करने के लिए आवश्यक सामान्य बहुमत सरकार ने सफलतापूर्वक हासिल कर लिया।
लोकसभा अध्यक्ष ने इन तीनों महत्वपूर्ण विधेयकों पर व्यापक विमर्श के लिए फिलहाल 12 घंटे का समय निर्धारित किया है। हालांकि, विपक्षी दलों की मांग को देखते हुए इस समय सीमा को बढ़ाया भी जा सकता है। सदन में चर्चा का दौर जारी है, जिसमें विभिन्न दलों के नेता अपनी राय रख रहे हैं। शुक्रवार शाम 4 बजे इन विधेयकों पर अंतिम मतदान (Voting) कराया जाएगा। मतदान से ठीक पहले गृहमंत्री अमित शाह चर्चा का जवाब देंगे, जिसमें वे विपक्ष द्वारा उठाए गए तकनीकी और राजनीतिक सवालों का स्पष्टीकरण देंगे।
लोकसभा में प्रक्रिया पूरी होने के बाद, इन विधेयकों को उच्च सदन यानी राज्यसभा में भेजा जाएगा। सरकार की योजना के अनुसार, राज्यसभा में 18 अप्रैल को इन विधेयकों पर चर्चा और मतदान की प्रक्रिया संपन्न होगी। उच्च सदन में बहस के लिए 10 घंटे का समय आवंटित किया गया है। सरकार का प्रयास है कि इस विशेष सत्र के दौरान ही इन विधेयकों को दोनों सदनों से पारित करा लिया जाए, ताकि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने का मार्ग प्रशस्त हो सके।
विधेयकों की प्रस्तुति के दौरान कांग्रेस सदस्य केसी वेणुगोपाल ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। इस पर गृहमंत्री अमित शाह ने पलटवार करते हुए कहा कि विपक्ष को केवल तकनीकी आपत्तियां उठाने का अधिकार है, वे इस स्तर पर विधेयकों के गुण-दोष की विस्तृत विवेचना नहीं कर सकते। शाह ने स्पष्ट किया कि सरकार बहस के दौरान विपक्ष के हर तर्क का मजबूती से जवाब देने के लिए तैयार है। सत्ता पक्ष का मानना है कि विपक्ष केवल प्रक्रियात्मक देरी करना चाहता है, जबकि सरकार महिलाओं के अधिकारों के प्रति प्रतिबद्ध है।
महिला आरक्षण के मुद्दे पर समाजवादी पार्टी का रुख काफी दिलचस्प रहा। सपा सदस्य धर्मेंद्र यादव ने सदन में कहा कि उनकी पार्टी तकनीकी रूप से इन तीन विशेष विधेयकों का विरोध करती है, लेकिन वे महिला आरक्षण के विचार के सबसे बड़े समर्थक हैं। पार्टी ने संकेत दिया है कि वे सैद्धांतिक रूप से आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन विधेयक के वर्तमान स्वरूप और परिसीमन से जुड़ी शर्तों पर उनकी अपनी चिंताएं हैं। पार्टी का कहना है कि वे इस मुद्दे पर किसी भी तरह का समझौता नहीं करेंगे, जिससे पिछड़े वर्ग की महिलाओं के हितों पर आंच आए।
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