Jagannath Temple Mystery: भगवान जगन्नाथ के सामने क्यों नहीं बजाया जाता शंख, जानिए प्राचीन मान्यता

Jagannath Temple Mystery:  ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर सनातन धर्म के सबसे पवित्र और सम्मानित तीर्थ स्थलों में से एक है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, उनके अग्रज बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन के लिए यहां उमड़ते हैं। यह मंदिर न केवल अपनी भव्यता के लिए, बल्कि अपनी अत्यंत अनूठी और प्राचीन पूजा-पद्धति के लिए भी विश्वभर में प्रसिद्ध है। इस मंदिर की परंपराएं अन्य हिंदू मंदिरों से काफी भिन्न हैं, जो इसे एक विशेष पहचान देती हैं।

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इनमें से सबसे दिलचस्प परंपरा मंदिर के गर्भगृह में शंख न बजाने की है। जहां भारत के अधिकांश मंदिरों में पूजा, आरती और विशेष अनुष्ठानों के दौरान शंखनाद अनिवार्य माना जाता है, वहीं श्रीमंदिर में इसे वर्जित रखा गया है। इसके पीछे की धार्मिक मान्यताएं और सदियों पुराना इतिहास श्रद्धालुओं के लिए सदा ही जिज्ञासा का विषय रहा है।

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रथयात्रा 2026: दिव्य आयोजन और परंपराओं का अद्भुत संगम

वर्ष 2026 में भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा 16 जुलाई से प्रारंभ होने जा रही है, जो 24 जुलाई को बहुदा यात्रा के साथ संपन्न होगी। इस महाआयोजन के दौरान देश-विदेश से करोड़ों भक्त पुरी में एकत्रित होकर भगवान के दिव्य दर्शन का लाभ उठाते हैं। रथयात्रा का अवसर भगवान जगन्नाथ की उन दुर्लभ परंपराओं को करीब से जानने का मौका देता है, जो साल भर चर्चा का विषय बनी रहती हैं। मंदिर परिसर में शंख का न बजना इन्हीं में से एक है। यह नियम मंदिर की उस सेवा-प्रणाली का हिस्सा है, जो पूरी तरह से शुचिता और अनुशासन पर आधारित है।

शंख निषेध का धार्मिक कारण: मुख-स्पर्श को माना जाता है ‘अशुद्ध’

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीजगन्नाथ मंदिर की सेवा-विधि अत्यंत कठोर और अनुशासित है। यहां भगवान को अर्पित की जाने वाली प्रत्येक सामग्री पूरी तरह पवित्र और स्पर्शरहित होनी चाहिए। शंख को बजाने के लिए उसमें मुख से फूंक मारनी पड़ती है। सनातन परंपरा के नियमों के तहत, मुंह से स्पर्श की गई किसी भी वस्तु को ‘झूठा’ या ‘अशुद्ध’ माना जाता है। चूंकि भगवान जगन्नाथ की सेवा में केवल शुद्ध और अभक्ष्य वस्तुओं का ही उपयोग किया जाता है, इसलिए मंदिर की परंपरा के अनुसार ऐसी वस्तु का उपयोग वर्जित है, जिसे पहले मुख से छुआ गया हो। यही कारण है कि गर्भगृह में शंख बजाना पूरी तरह प्रतिबंधित है, ताकि भगवान की सेवा की पवित्रता अक्षुण्ण बनी रहे।

मंदिर की अनूठी नीतियां: क्या शंखनाद पूरी तरह प्रतिबंधित है?

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि मंदिर के भीतर, विशेषकर गर्भगृह और भगवान की प्रत्यक्ष सेवा के समय ही शंख का उपयोग नहीं किया जाता है। मंदिर के बाहर या अन्य धार्मिक अवसरों पर शंखनाद की परंपरा अलग हो सकती है। जगन्नाथ मंदिर अपनी अनूठी ‘नीतियों’ और सेवा-विधि के कारण ही पूरे विश्व में विख्यात है। भारत के विभिन्न मंदिरों में पूजा के नियम स्थान-काल के अनुसार भिन्न होते हैं, और पुरी का मंदिर इसी विविधता का प्रतीक है। यहां भगवान को प्रतिदिन छप्पन भोग अर्पित किया जाता है और सेवायत परंपरागत नियमों का पूरी निष्ठा के साथ पालन करते हैं।

आस्था का महापर्व: रथयात्रा और समानता का संदेश

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, सेवा और समानता का सबसे बड़ा पर्व है। मान्यता है कि इस दिन भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच सड़क पर आते हैं और बिना किसी भेदभाव के सभी को दर्शन देते हैं। रथयात्रा में सम्मिलित होना और भगवान के दर्शन करना विशेष पुण्यकारी माना जाता है। मंदिर की रहस्यमयी परंपराएं, जैसे कि शंख न बजाना या दुनिया की सबसे बड़ी रसोई (महाप्रसाद), इस तीर्थ स्थल को न केवल आस्था का केंद्र बनाती हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस गहराई से भी जोड़ती हैं, जिसे समझना एक आध्यात्मिक अनुभव है।

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Chandan Das

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