Maa Durga Lion Story : जिस शेर का इरादा था पार्वती को निगलना, वही बना मां दुर्गा की सवारी

देवी पार्वती घोर तपस्या में लीन थीं, तभी एक भूखा शेर उन्हें अपना शिकार बनाने पहुंचा। लेकिन माता की तपस्या और दिव्य शक्ति देखकर वह वहीं रुक गया। वर्षों तक इंतजार करने वाले इस शेर को आखिर मां पार्वती ने ऐसा क्या वरदान दिया कि वही आगे चलकर मां दुर्गा की सवारी बन गया?

Maa Durga Lion Story : हिंदू धर्म में मां दुर्गा को शक्ति, साहस और दिव्य ऊर्जा की सर्वोच्च देवी के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें जगत जननी, आदि शक्ति और संपूर्ण ब्रह्मांड की माता कहा गया है। मां दुर्गा को बुराई, अधर्म और अज्ञान का नाश करने वाली देवी माना जाता है। भारत के अलग-अलग हिस्सों में देवी के अनेक प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहां श्रद्धालु पूरी आस्था के साथ उनकी आराधना करते हैं। मां दुर्गा का स्वरूप उनके दिव्य वाहन शेर के बिना अधूरा माना जाता है।

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आखिर शेर ही क्यों बना मां दुर्गा का दिव्य वाहन?

मां दुर्गा को अक्सर शेर पर सवार दिखाया जाता है। यही वजह है कि उन्हें मां शेरावाली के नाम से भी पुकारा जाता है। लेकिन धार्मिक कथाओं में यह सवाल काफी रोचक है कि जंगल का शक्तिशाली और हिंसक शेर आखिर देवी का वाहन कैसे बना। इस संबंध में श्रीमद् देवीभागवत पुराण से जुड़ी एक पौराणिक कथा का उल्लेख मिलता है, जिसमें देवी पार्वती की कठिन तपस्या और एक शेर की प्रतीक्षा का विशेष वर्णन किया गया है।

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भगवान शिव को पाने के लिए पार्वती ने की घोर तपस्या

पौराणिक कथा के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए लंबे समय तक कठोर तपस्या की। उनकी साधना अत्यंत कठिन थी और उन्होंने कई वर्षों तक भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तप किया। उनकी तपस्या से प्रभावित होकर भगवान शिव अंततः प्रकट हुए और पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। विवाह के बाद भी एक प्रसंग ऐसा आया, जिसने माता पार्वती को दोबारा कठोर तपस्या के लिए प्रेरित किया।

शिव के एक संबोधन से नाराज हुईं माता पार्वती

कथा के मुताबिक, लगातार तपस्या करने के कारण माता पार्वती का रंग काफी गहरा पड़ गया था। एक अवसर पर भगवान शिव ने उन्हें काली कहकर संबोधित कर दिया। यह बात माता पार्वती को अच्छी नहीं लगी और वह नाराज होकर फिर से तपस्या करने चली गईं। उन्होंने अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त करने के लिए कठिन साधना शुरू कर दी। इसी दौरान उनकी तपस्या के स्थान पर एक शेर भी पहुंच गया।

देवी को भोजन बनाने की इच्छा से वहां पहुंचा शेर

बताया जाता है कि वह शेर देवी पार्वती को अपना भोजन बनाना चाहता था। हालांकि, वह तुरंत देवी पर हमला नहीं करता, बल्कि उनकी तपस्या समाप्त होने की प्रतीक्षा करने लगता है। समय बीतता गया और शेर वहीं रहकर देवी की साधना पूरी होने का इंतजार करता रहा। कई वर्षों तक इंतजार करने के बाद जब उसके मन में देवी को खाने की इच्छा हुई, तब भी वह उनके पास नहीं जा सका।

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तप के तेज के सामने पीछे हट गया शक्तिशाली शेर

कथा में बताया गया है कि माता पार्वती की तपस्या इतनी प्रभावशाली थी कि उनका दिव्य तेज शेर को उनके करीब जाने से रोक देता था। शेर ने कई बार देवी के पास पहुंचने की कोशिश की, लेकिन हर बार पीछे हट गया। अंततः वह एक कोने में बैठकर माता की तपस्या पूरी होने का इंतजार करने लगा। इस तरह भोजन की तलाश में आया शेर अनजाने में लंबे समय तक देवी के समीप रहकर तपस्या का साक्षी बन गया।

भगवान शिव ने पार्वती को दिया मनचाहा वरदान

कई वर्षों की कठोर साधना के बाद भगवान शिव एक बार फिर माता पार्वती के सामने प्रकट हुए। उन्होंने प्रसन्न होकर देवी से वरदान मांगने को कहा। माता पार्वती ने भगवान शिव से अपना पूर्व जैसा गौर वर्ण वापस पाने की इच्छा व्यक्त की। भगवान शिव ने उनकी मनोकामना पूरी कर दी। इसके बाद माता पार्वती स्नान करने चली गईं और उनके शरीर से निकला काला आवरण एक अन्य देवी के रूप में प्रकट हुआ, जिन्हें कौशिकी कहा गया।

इसी कारण माता पार्वती कहलाने लगीं मां गौरी

पौराणिक मान्यता के अनुसार, शरीर से काला रंग अलग होने के बाद माता पार्वती का स्वरूप पहले की तरह उज्ज्वल हो गया। इसी वजह से उन्हें मां गौरी के नाम से भी जाना जाने लगा। स्नान के बाद जब माता की नजर उस शेर पर पड़ी, जो वर्षों से उनके पास बैठकर उनकी तपस्या पूरी होने की प्रतीक्षा कर रहा था, तो उन्होंने उसके धैर्य और प्रतीक्षा को देखा।

पार्वती ने शेर को अपनी सवारी बनाने का वरदान मांगा

माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि यह शेर लंबे समय से उन्हें भोजन के रूप में पाने की इच्छा रखते हुए भी वहीं बैठा रहा। देवी ने माना कि जिस अवधि तक उन्होंने तपस्या की, उतने लंबे समय तक शेर ने भी उनके साथ रहकर प्रतीक्षा की। माता ने भगवान शिव से उस शेर को अपनी सवारी बनाने का वरदान देने का आग्रह किया। भगवान शिव ने देवी की इच्छा स्वीकार कर ली और शेर को उनका दिव्य वाहन बना दिया।

तभी से मां दुर्गा कहलाती हैं शेरावाली

भगवान शिव का आशीर्वाद मिलने के बाद माता पार्वती शेर पर सवार हुईं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी प्रसंग के बाद देवी के शेर पर सवार स्वरूप की विशेष महिमा स्थापित हुई और उन्हें मां शेरावाली तथा मां दुर्गा के नाम से पूजा जाने लगा। यह कथा प्रतीकात्मक रूप से बताती है कि देवी की शक्ति के सामने हिंसक स्वभाव भी नियंत्रण और समर्पण में बदल सकता है। इसी कारण मां दुर्गा के साथ शेर को शक्ति, साहस और निर्भीकता का प्रतीक माना जाता है।

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Chandan Das

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