Mahabharata 18 Parva Story: द्वापर युग के अंतिम चरण में लड़ा गया महाभारत का युद्ध इतिहास का सबसे भीषण संग्राम माना जाता है। कौरवों और पांडवों के बीच कुरुक्षेत्र की भूमि पर खेला गया यह महायुद्ध पूरे 18 दिनों तक चला था। इस धर्मयुद्ध में अंततः पांडवों की विजय हुई क्योंकि वे धर्म की राह पर थे। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाकाव्य ‘महाभारत’ केवल एक युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें संपूर्ण हस्तिनापुर साम्राज्य का उतार-चढ़ाव और मानव जीवन का दर्शन समाहित है। इस विशाल ग्रंथ को कुल 18 पर्वों (अध्यायों) में विभाजित किया गया है, जो मानव उत्पत्ति से लेकर मोक्ष तक की यात्रा को दर्शाते हैं।

आदि पर्व से विराट पर्व: पांडवों के जन्म और अज्ञातवास की कहानी
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आदि पर्व: यह ग्रंथ का पहला खंड है। इसमें कुरु वंश के इतिहास, राजा दुष्यंत-शकुंतला की अमर प्रेम कथा, पांडवों व कौरवों के जन्म और लाक्षागृह के षड्यंत्र का विस्तृत वर्णन मिलता है।
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सभा पर्व: इस अध्याय में मयदानव द्वारा इंद्रप्रस्थ के निर्माण, कपटपूर्ण द्यूत क्रीड़ा (जुए का खेल), द्रौपदी के चीरहरण और पांडवों को मिले 12 वर्ष के वनवास व 1 वर्ष के अज्ञातवास की रूपरेखा तय होने का उल्लेख है।
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वन पर्व: इसमें पांडवों के वनवास के कठिन दिन, उनकी तीर्थ यात्राएं, प्रसिद्ध यक्ष-युधिष्ठिर संवाद और अर्जुन द्वारा तपस्या करके दिव्यास्त्र प्राप्त करने की कथा है।
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विराट पर्व: इस पर्व में पांडवों द्वारा राजा विराट की नगरी में भेष बदलकर बिताए गए अज्ञातवास और अभिमन्यु व राजकुमारी उत्तरा के विवाह का प्रसंग आता है।
उद्योग पर्व से द्रोण पर्व: शांति का प्रयास और महायुद्ध का आरंभ
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उद्योग पर्व: युद्ध से ठीक पहले भगवान श्रीकृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर जाते हैं। दुर्योधन द्वारा शांति प्रस्ताव ठुकराए जाने और दोनों पक्षों द्वारा युद्ध की तैयारियों का वर्णन इसमें है।
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भीष्म पर्व: इस महत्वपूर्ण मोड़ पर कुरुक्षेत्र का युद्ध शुरू होता है। पितामह भीष्म दस दिनों तक कौरवों के सेनापति रहते हैं। इसी पर्व में श्रीकृष्ण अर्जुन को ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का दिव्य उपदेश देते हैं और अंत में भीष्म बाणों की शय्या पर लेट जाते हैं।
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द्रोण पर्व: भीष्म के बाद द्रोणाचार्य सेनापति बनते हैं। इसमें चक्रव्यूह की रचना, अभिमन्यु वध, द्रोणाचार्य के वध और कर्ण-अर्जुन के बीच हुए महासंग्राम का रोमांचकारी विवरण है।
शल्य पर्व से अनुशासन पर्व: युद्ध का अंत और भीष्म का अंतिम उपदेश
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शल्य पर्व: इसमें मद्रराज शल्य के सेनापति बनने, युधिष्ठिर द्वारा उनका वध होने और भीम द्वारा दुर्योधन की जंघा तोड़कर युद्ध समाप्त करने की कथा है।
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सौप्तिक पर्व: युद्ध के बाद अश्वत्थामा द्वारा रात के अंधेरे में किए गए कायरतापूर्ण हमले और पांडवों के पांचों पुत्रों की हत्या का दुःखद वृतांत इसमें मिलता है।
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स्त्री पर्व: इस अध्याय में युद्ध में मारे गए योद्धाओं की पत्नियों और माताओं का विलाप, गांधारी का शोक और युधिष्ठिर द्वारा सभी मृतकों का सामूहिक दाह-संस्कार करने का मार्मिक वर्णन है।
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शांति पर्व: युद्ध के बाद शोकाकुल युधिष्ठिर को सांत्वना देने के लिए श्रीकृष्ण उन्हें भीष्म पितामह के पास ले जाते हैं, जहां भीष्म उन्हें राजधर्म और मोक्ष का ज्ञान देते हैं।
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अनुशासन पर्व: इसमें भीष्म पितामह युधिष्ठिर को दान, सदाचार और धर्म के नियम सिखाते हैं और सूर्य के उत्तरायण होने पर अपने प्राण त्याग देते हैं।
अश्वमेधिक पर्व से स्वर्गारोहण: यदुवंश का नाश और पांडवों का महाप्रस्थान
महाभारत के अंतिम खंडों में जीवन की नश्वरता को दर्शाया गया है। ‘अश्वमेधिक पर्व’ में राजा बनने के बाद युधिष्ठिर राज्य की सुख-समृद्धि के लिए अश्वमेध यज्ञ का आयोजन करते हैं। इसके बाद ‘आश्रमवासिक पर्व’ में धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती वन में निवास करने चले जाते हैं, जहां जंगल की आग में झुलसकर उनकी मृत्यु हो जाती है। ‘मौसल पर्व’ में गांधारी के श्राप के कारण पूरे यदुवंश का विनाश हो जाता है और भगवान श्रीकृष्ण भी एक शिकारी के बाण से अपनी लीला समाप्त कर वैकुंठ लौट जाते हैं। अंत में, ‘महाप्रस्थानिक’ और ‘स्वर्गारोहण पर्व’ में पांडव परीक्षित को राजपाट सौंपकर हिमालय की ओर अपनी अंतिम यात्रा पर निकल जाते हैं, जहां युधिष्ठिर सशरीर स्वर्ग पहुंचते हैं।

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