Maharashtra UCC: उत्तराखंड की तर्ज पर अब भाजपा शासित महाराष्ट्र ने भी राज्य में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) को लागू करने की दिशा में निर्णायक कदम उठा लिया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राज्य विधानसभा में एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए बताया कि महाराष्ट्र के लिए यूसीसी का मसौदा तैयार करने हेतु सात सदस्यीय उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया गया है। इस समिति की कमान सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना देसाई को सौंपी गई है, जो अपनी कानूनी विशेषज्ञता के लिए जानी जाती हैं। राज्य सरकार का मानना है कि यह पहल न केवल संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है, बल्कि समाज के सभी वर्गों के लिए एक न्यायपूर्ण और समान कानूनी ढांचा सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक निर्णय है।

सात सदस्यीय टीम और कार्ययोजना: छह महीने में रिपोर्ट का लक्ष्य
न्यायमूर्ति रंजना देसाई की अध्यक्षता में गठित इस सात सदस्यीय समिति में कानून, प्रशासन और शिक्षा जगत के प्रबुद्ध चेहरे शामिल हैं। समिति के अन्य प्रमुख सदस्यों में पूर्व उच्च न्यायालय न्यायाधीश आर सी चव्हाण और एस जी मेहरे, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव डी के जैन, पूर्व महाधिवक्ता वीरेंद्र सराफ, प्रसिद्ध संवैधानिक विशेषज्ञ रमेश पटांगे और शिक्षाविद सुवर्णा रावल शामिल हैं। मुख्यमंत्री फडणवीस ने स्पष्ट किया कि समिति को अपना मसौदा तैयार करने के लिए छह महीने का समय दिया गया है। सरकार की मंशा है कि इस प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाते हुए नागपुर में होने वाले राज्य विधानसभा के आगामी शीतकालीन सत्र में यूसीसी विधेयक को सदन के पटल पर पेश किया जाए। यह समिति संविधान के राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों (Directive Principles of State Policy) का पालन करते हुए अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपेगी।

समान नागरिक संहिता: समानता और सशक्तिकरण का मार्ग
समान नागरिक संहिता का मूल उद्देश्य भारत में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून की व्यवस्था करना है, चाहे उनकी धार्मिक आस्था, जाति या लिंग कुछ भी हो। वर्तमान व्यवस्था में विवाह, तलाक, संपत्ति के उत्तराधिकार और बच्चा गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामले विभिन्न धर्मों के अपने-अपने पर्सनल लॉ (Personal Law) द्वारा शासित होते हैं। यूसीसी लागू होने का अर्थ है कि ये अलग-अलग धार्मिक कानून समाप्त हो जाएंगे और पूरे राज्य के लिए एक समान नागरिक कानून प्रभावी होगा। इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू लैंगिक समानता और महिलाओं का सशक्तिकरण है। कई व्यक्तिगत कानूनों में महिलाओं को संपत्ति और तलाक के अधिकारों के मामले में भेदभाव का सामना करना पड़ता है, और बहुविवाह जैसी कुप्रथाएं भी प्रचलित हैं। यूसीसी के आने से इन विसंगतियों को दूर करने और सभी नागरिकों, विशेषकर महिलाओं को पुरुषों के बराबर कानूनी अधिकार मिलने की प्रबल संभावना है।
एक नई कानूनी संस्कृति की ओर अग्रसर महाराष्ट्र
महाराष्ट्र सरकार का यह कदम देश के कानूनी परिदृश्य में एक व्यापक बहस और परिवर्तन का सूत्रपात करने वाला है। मुख्यमंत्री द्वारा समयबद्ध तरीके से समिति के गठन और रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश यह दर्शाता है कि सरकार इस विषय को लेकर अत्यंत गंभीर है। यदि यह कानून लागू होता है, तो यह महाराष्ट्र के सामाजिक ढांचे में एक बड़ा बदलाव लाएगा, जिससे नागरिक कानून अधिक आधुनिक, पारदर्शी और समावेशी बन सकेंगे। समिति की रिपोर्ट और इसके बाद प्रस्तावित विधेयक राज्य की राजनीति और सामाजिक समरसता के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे, जिन पर देश भर की निगाहें टिकी रहेंगी।
Read more : India-New Zealand Trade Deal: पहले दिन से 57% भारतीय निर्यात शुल्क मुक्त, व्यापार को मिलेगा बड़ा बूस्ट











