Child Trafficking Case: देश में नाबालिग लड़कियों के अपहरण और उन्हें जबरन शादी के लिए बेचने का घिनौना धंधा एक बार फिर उजागर हुआ है। ताजा मामला पश्चिम बंगाल से सामने आया है, जहां एक किशोरी का अपहरण कर उसे फर्जी दस्तावेजों के जरिए बालिग घोषित किया गया और फिर दो बार विवाह के लिए बेचा गया।
यह मामला तब सामने आया जब पीड़िता की मां ने अपनी बेटी की तलाश में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। करीब दो वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई और राज्य एजेंसियों की विफलता के बाद कोर्ट ने मामला CBI को सौंपा, जिसने अब जाकर राजस्थान के पाली जिले से लड़की को सुरक्षित बरामद किया है।
जानकारी के अनुसार, पश्चिम बंगाल की रहने वाली यह नाबालिग लड़की अचानक लापता हो गई थी। परिवार ने पहले स्थानीय पुलिस में शिकायत की, लेकिन सही कार्रवाई न होने पर मामला हाई कोर्ट पहुंचा। इस बीच, बच्ची को पहले राजस्थान लाया गया, जहां उसके आधार और जन्म प्रमाणपत्र में हेरफेर कर उसे 18 साल से ऊपर दिखाया गया। CBI जांच में सामने आया कि लड़की को पहले एक व्यक्ति को विवाह के लिए बेचा गया, लेकिन कुछ समय बाद दूसरी बार एक और व्यक्ति को सौंप दिया गया। दोनों बार यह शादी जबरन करवाई गई और लड़की को किसी सामान की तरह इस्तेमाल किया गया।
CBI ने अपनी जांच के दौरान कई राज्यों में छापेमारी की। तकनीकी निगरानी और स्थानीय सूचनाओं के आधार पर आखिरकार पाली जिले के एक गांव से लड़की को बरामद किया गया। पीड़िता ने अधिकारियों को बताया कि उसे न केवल मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी, बल्कि हर बार उसे यह बताया गया कि वह बालिग है और शादी कानूनी है।
जांच अधिकारियों के मुताबिक, पीड़िता की आपबीती सुनकर रोंगटे खड़े हो गए। उसे घर से दूर, अनजान लोगों के बीच कैद कर रखा गया था। जब उसने विरोध किया तो उसे धमकाया गया, मारपीट की गई और बार-बार कहा गया कि वह अब किसी की पत्नी है।
यह मामला कई अहम सवाल खड़े करता है —किस तरह फर्जी दस्तावेजों के जरिए एक नाबालिग को बालिग दिखाया गया? राज्य की पुलिस इस पूरे दौरान क्या कर रही थी?शादी के नाम पर लड़कियों की तस्करी का नेटवर्क कब तक खुलेआम चलता रहेगा? CBI ने अब पूरे नेटवर्क की जांच शुरू कर दी है। इसमें शामिल बिचौलिए, दस्तावेज बनाने वाले और खरीदारों की भूमिका की पड़ताल की जा रही है। प्रारंभिक जांच में यह संकेत मिले हैं कि यह संगठित मानव तस्करी गिरोह का हिस्सा था।
इस दर्दनाक घटना में मां की हिम्मत और न्याय व्यवस्था पर विश्वास की जीत हुई है। हालांकि, यह सवाल रह जाता है कि अगर समय रहते राज्य पुलिस ने कार्रवाई की होती, तो शायद बच्ची को दो साल तक यह यातना न सहनी पड़ती। यह मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि देश में लड़कियों की सुरक्षा केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करने से होगी।
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