Srinagar Violence Case: जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी तत्वों के खिलाफ राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने अपना शिकंजा और अधिक कस लिया है। करीब तीन दशक पुराने 1996 श्रीनगर हिंसा मामले में NIA ने एक निर्णायक कदम उठाते हुए हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के छह वरिष्ठ अलगाववादी नेताओं के विरुद्ध चार्जशीट दायर की है। इस चार्जशीट में शब्बीर अहमद शाह का नाम भी प्रमुखता से शामिल है, जो पहले से ही कई अन्य गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। इस कार्रवाई को घाटी में अलगाववादी नेटवर्क को नेस्तनाबूद करने की दिशा में एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

चार्जशीट में शामिल प्रमुख नाम
NIA ने जम्मू की विशेष अदालत में जो विस्तृत चार्जशीट पेश की है, उसमें शब्बीर अहमद शाह के अलावा सैयद अली शाह गिलानी, अब्दुल गनी लोन, मोहम्मद याकूब वकील, जावेद अहमद मीर और शकील अहमद बख्शी को आरोपी के रूप में नामजद किया गया है। इन सभी पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जिनमें आपराधिक साजिश रचना, हत्या का प्रयास करना, दंगा भड़काना, सरकारी कर्मचारियों पर जानलेवा हमला करना और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 13 के तहत दंडनीय अपराध शामिल हैं। यह कानूनी प्रक्रिया दशकों पुरानी हिंसा के दोषियों को जवाबदेह ठहराने के सरकार के संकल्प को दर्शाती है।

मृत आरोपियों पर भी साक्ष्य मौजूद
न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार, इस चार्जशीट में शामिल आरोपियों में से सैयद अली शाह गिलानी, अब्दुल गनी लोन और मोहम्मद याकूब वकील की मृत्यु हो चुकी है, जिसके चलते उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही को समाप्त कर दिया गया है। इसके बावजूद, NIA ने स्पष्ट किया है कि गहन जांच के दौरान इन मृत नेताओं की साजिश में सीधी संलिप्तता के पर्याप्त और ठोस सबूत मिले हैं, जो यह साबित करते हैं कि उस समय हिंसा के पीछे इनका मास्टरमाइंड की तरह हाथ था।
क्या था 1996 का वह चर्चित मामला?
NIA की रिपोर्ट के अनुसार, 17 जुलाई 1996 को श्रीनगर के नाज क्रॉसिंग पर आतंकी हिलाल अहमद बेग के जनाजे के दौरान इन अलगाववादी नेताओं ने सुनियोजित तरीके से भीड़ का नेतृत्व किया था। जांच में यह तथ्य सामने आया है कि जनाजे की आड़ में भीड़ में कई हथियारबंद आतंकी शामिल थे, जिन्होंने सुनियोजित तरीके से पुलिस बल पर अंधाधुंध गोलीबारी की। इस हमले में कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए और पथराव के कारण सरकारी संपत्तियों को भारी नुकसान पहुँचाया गया। उस दौरान भीड़ ने भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक नारे लगाकर क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने का प्रयास किया था।
साजिश का पर्दाफाश और आगे की जांच
जांच एजेंसी का मानना है कि यह हिंसा कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि पहले से रची गई एक गहरी साजिश थी। इन नेताओं ने भड़काऊ भाषण देकर लोगों को सशस्त्र संघर्ष के लिए उकसाया और जनाजे को हुर्रियत की ताकत प्रदर्शित करने का जरिया बनाया। इस मामले में मूल FIR 17 जुलाई 1996 को श्रीनगर के शेरगढ़ी थाने में दर्ज की गई थी, जिसे गृह मंत्रालय के निर्देश पर अप्रैल 2026 में NIA ने अपने हाथ में लिया। इस मामले की विस्तृत जांच अभी भी जारी है, जिससे भविष्य में और भी बड़े खुलासे होने की पूरी संभावना है।
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