ऑनलाइन सट्टा प्रकरण : अंबिकापुर अदालत ने आरोपी अम्मी गिरी की जमानत याचिका खारिज की

Online betting episode : चतुर्थ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश मनीष कुमार दुबे की अदालत ने आनलाइन सट्टा के प्रकरण में जेल में निरुद्ध आरोपी अम्मी गिरी (23) निवासी बुंदिया दर्रीपारा भटगांव की जमानत याचिका खारिज कर दी है। आरोपी ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी बरखा रानी वर्मा की अदालत द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध पुनरीक्षण जमानत याचिका प्रस्तुत की थी। निचली अदालत के आदेश को यथावत रखते हुए चतुर्थ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश मनीष कुमार दुबे की अदालत ने पुनरीक्षण आवेदन को सारहीन बताते हुए निरस्त कर दिया है।

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अतिरिक्त लोक अभियोजक विनोद कुमार दुबे ने बताया कि आरोपी अम्मी गिरी के साथ अन्य आरोपियों को कोतवाली अंबिकापुर द्वारा गिरफ्तार किया गया था। 13 जनवरी को गिरफ्तार अम्मी गिरी की ओर से पूर्व में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी बरखा रानी वर्मा की अदालत में जमानत आवेदन प्रस्तुत किया गया था। जिसे 23 जुलाई 2025 को न्यायालय द्वारा अस्वीकार कर दिया गया। इसी के विरुद्ध आरोपी ने अधिवक्ता के माध्यम से चतुर्थ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश मनीष कुमार दुबे की अदालत में पुनरीक्षण आवेदन प्रस्तुत किया था। अदालत ने कहा है कि अभिलेख के अवलोकन से स्पष्ट है कि धारा-336 (3), 338, 61 (2) एवं धारा 340 (2) में चार अप्रैल 2025 को अभियोग पत्र प्रस्तुत किया गया है। जिसमें आरोपीगण द्वारा विभिन्न लोगों के सिम कार्ड का उपयोग कर आनलाइन सट्टा खिलवाने में उपयोग किया जाता है और विभिन्न लोगों से उनके सिम कार्ड का उपयोग कर अत्यधिक राशि छलपूर्वक प्राप्त की गई है।

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विचारण न्यायालय ने 29 अप्रैल 2025 को पुनरीक्षणकर्ता एवं अन्य आरोपीगण के विरूद्ध धारा-336 (3), 338, 61 (2) एवं धारा 340 (2) का आरोप विरचित किया है। विचारण न्यायालय ने पुनरीक्षणकर्ता की ओर से प्रस्तुत आवेदन को निरस्त करने का कारण अभियुक्त पर गंभीर प्रकृति के आर्थिक अपराध का दोष होना पाया है जिसके कारण समाज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। आरोपी के विरूद्ध धारा 338 भारतीय न्याय संहिता का आरोप विरचित किया गया है। उक्त अपराध आजीवन कारावास से दण्डनीय है। मजिस्ट्रेट न्यायालय ने आदेश में पुनरीक्षणकर्ता के आवेदन को अपराध की गंभीरता एवं उसके समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को दृष्टिगत रखते हुए निरस्त करने का जो कारण दर्शित किया है वह उचित है जिसमें किसी प्रकार की कोई विधिक त्रुटि नहीं है। अतः पुनरीक्षणकर्ता की ओर से प्रस्तुत पुनरीक्षण आवेदन सारहीन होने से निरस्त किया जाता है।

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