Kashmir Politics: यासीन मलिक विवाद, कांग्रेस ने उठाए सवाल, BJP-RSS पर साधा निशाना

Kashmir Politics:  दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल यासीन मलिक के हलफनामे को लेकर देश की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर सीधा हमला बोला है। खेड़ा ने आरोप लगाया कि बीजेपी, चुनावी ‘वोट चोरी’ से ध्यान भटकाने के लिए यासीन मलिक के हलफनामे को चुनिंदा हिस्सों में लीक कर रही है।

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पवन खेड़ा का तीखा सवाल: BJP बताए RSS और यासीन के बीच क्या बात हुई?

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कांग्रेस नेता ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए तीन बड़े सवाल खड़े किए:

2011 में जब बीजेपी सत्ता में नहीं थी, तो RSS यासीन मलिक से क्यों मिल रहा था?

विवेकानंद फाउंडेशन, जो कि BJP-समर्थित थिंक टैंक माना जाता है, यासीन मलिक से बातचीत क्यों कर रहा था? वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में यासीन मलिक और धीरूभाई अंबानी के बीच फोन पर बातचीत कराने का मकसद क्या था?

‘वाजपेयी ने भी किया था हस्तक्षेप’

पवन खेड़ा ने साल 2007 की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि जब यासीन मलिक ‘सफर-ए-आजादी’ नाम से एक मार्च निकालने जा रहे थे, तब उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके बाद पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने खुद हस्तक्षेप कर यूपीए सरकार से मार्च की अनुमति दिलवाई थी।उन्होंने लिखा, “अगर मनमोहन सिंह के शिष्टाचार पर सवाल उठाना है, तो फिर अटल बिहारी वाजपेयी की हुर्रियत नेताओं से मुलाकात या लालकृष्ण आडवाणी की जिन्ना की मजार पर यात्रा पर भी चर्चा होनी चाहिए।”

‘यह संवाद की नीति का हिस्सा था’

खेड़ा ने कहा कि, “उस दौर में भारत की नीति थी – संवाद। चाहे वह वाजपेयी सरकार हो या मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार। दोनों ने ही समय-समय पर कश्मीर से जुड़े विभिन्न पक्षों से बातचीत की। इसे अब ‘राष्ट्रविरोधी’ करार देना राजनीति का सबसे निचला स्तर है।”

बीजेपी पर लगाया ‘राजनीतिक टूलकिट’ का आरोप

पवन खेड़ा ने कहा कि यह पूरा विवाद एक राजनीतिक टूलकिट का हिस्सा है, जिसका मकसद लोगों का ध्यान चुनावों में हुई कथित गड़बड़ियों और असल मुद्दों से हटाना है। उन्होंने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा, “अगर संवाद को देशद्रोह कहा जाएगा तो फिर हर सरकार पर उंगली उठानी पड़ेगी जिसने कश्मीर में शांति के लिए कोशिश की। बीजेपी को पहले खुद के इतिहास से सवाल पूछना चाहिए।”

यासीन मलिक का हलफनामा जहां एक ओर न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है, वहीं इसके आधार पर राजनीतिक बयानबाजी ने मामले को तूल दे दिया है। कांग्रेस और बीजेपी दोनों अपने-अपने नेताओं के बयानों और कदमों को औचित्यपूर्ण ठहराने की कोशिश में लगे हैं। लेकिन एक बार फिर कश्मीर, आतंकवाद और संवाद नीति जैसे संवेदनशील मुद्दे राजनीतिक हथियार बनते नजर आ रहे हैं।

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