Political Crisis
Political Crisis : आम आदमी पार्टी (AAP) के 14 साल के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक भूचाल आ गया है। दिग्गज नेता और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने पार्टी को अलविदा कहकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया है। उनके साथ 6 अन्य सांसदों ने भी पाला बदला है, जिससे पंजाब और दिल्ली की राजनीति में खलबली मच गई है। सांसदों की इस बड़ी टूट ने अरविंद केजरीवाल की रणनीतियों को ध्वस्त कर दिया है और पार्टी के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
राघव चड्ढा सहित 7 सांसदों के भाजपा में शामिल होने से आम आदमी पार्टी का संसदीय कोटा बुरी तरह प्रभावित हुआ है। विशेष रूप से पंजाब से आने वाले सांसदों की संख्या अब घटकर केवल 3 रह गई है। दो-तिहाई सांसदों का एक साथ जाना न केवल तकनीकी रूप से दलबदल कानून के तहत पार्टी को कमजोर करता है, बल्कि यह अरविंद केजरीवाल की सांगठनिक पकड़ पर भी गहरी चोट है। अब केजरीवाल के सामने पहली बड़ी चुनौती इन खाली सीटों को भरने और पंजाब के राजनीतिक समीकरणों को फिर से व्यवस्थित करने की है।
सांसदों की इस बगावत के बाद अरविंद केजरीवाल के लिए दूसरी और सबसे गंभीर चिंता दिल्ली के 22 विधायकों को लेकर है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सांसदों के बाद अब विधायकों पर भी सेंधमारी की कोशिशें तेज हो सकती हैं। दिल्ली ‘आप’ का सबसे मजबूत और पुराना किला है, और यदि यहां 22 विधायकों में कोई भी फूट पड़ती है, तो पार्टी की सत्ता खतरे में पड़ सकती है। केजरीवाल को अब अपने विधायकों को एकजुट रखने के लिए भारी मशक्कत करनी होगी, क्योंकि राघव चड्ढा ने इशारों-इशारों में संकेत दिया है कि वे अभी और भी ‘बड़े गेम’ खेलने की तैयारी में हैं।
पंजाब के कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा आम है कि जिन सांसदों ने पार्टी छोड़ी है, उनमें से अधिकांश बड़े बिजनेसमैन हैं। उन पर केंद्रीय जांच एजेंसियों (ED) के छापों का दबाव था, जिसे इस पाला बदलने की एक मुख्य वजह माना जा रहा है। ये नेता न केवल खुद भाजपा में गए हैं, बल्कि अपने साथ भारी संख्या में समर्थकों और कार्यकर्ताओं को भी ले गए हैं। 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले इस तरह का बिखराव पार्टी के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।
भाजपा में शामिल होने के बाद राघव चड्ढा का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से दावा किया है कि यह तो केवल शुरुआत है और आने वाले दिनों में आम आदमी पार्टी के कई और चेहरे उनके साथ भाजपा के मंच पर नजर आएंगे। चड्ढा के इस बयान ने केजरीवाल की रातों की नींद उड़ा दी है। राघव की बातों को अब ‘हल्के’ में लेना पार्टी के लिए जोखिम भरा हो सकता है क्योंकि वे अंदरूनी सूत्रों और पार्टी की कमजोर कड़ियों से बखूबी वाकिफ हैं।
कुल मिलाकर, आम आदमी पार्टी इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। एक तरफ जहां शीर्ष नेतृत्व कानूनी लड़ाइयों में उलझा है, वहीं दूसरी तरफ संगठनात्मक ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढह रहा है। अरविंद केजरीवाल को अब कोई ऐसा ‘मास्टरस्ट्रोक’ खेलना होगा जिससे वे अपने शेष कुनबे को बिखरने से बचा सकें। यदि दिल्ली और पंजाब के विधायकों को टूटने से नहीं रोका गया, तो पार्टी का भविष्य अंधकारमय हो सकता है।
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