Railway Monetization
Railway Monetization: केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार वित्तीय सुधारों के नाम पर सरकारी एजेंसियों और संपत्तियों के निजीकरण (Privatization) के अभियान को नई गति देने जा रही है। खजाने के घाटे को नियंत्रित करने और भविष्य के खर्चों को पूरा करने के लिए सरकार ने सरकारी एसेट्स और शेयरों को बेचने का एक बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया है। इस पूरी प्रक्रिया का मुख्य आधार ‘नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन’ (NMP) को बनाया गया है। गौरतलब है कि NMP के पहले चरण में सरकार ने एलआईसी (LIC) और एयर इंडिया जैसी संस्थाओं के शेयर बेचकर विनिवेश की शुरुआत की थी। अब सरकार उन रुकी हुई सूचियों को दोबारा सक्रिय कर रही है जिनमें कई सरकारी बैंकों और एजेंसियों के नाम शामिल हैं।
इस बार सरकार के निजीकरण के एजेंडे में भारतीय रेलवे सबसे ऊपर है। नीति आयोग द्वारा तैयार किए गए खाके के अनुसार, रेलवे के एसेट्स और विभिन्न रेलवे एजेंसियों के शेयर बेचकर सरकारी खजाने में 2.5 लाख करोड़ रुपये डालने का टारगेट रखा गया है। इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए रेल मंत्रालय, वित्त मंत्रालय के ‘डिपार्टमेंट ऑफ इन्वेस्टमेंट एंड पब्लिक एसेट मैनेजमेंट’ (DIPAM) और नीति आयोग के बीच उच्च स्तरीय बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। सरकार का प्रस्ताव है कि रेलवे की प्रमुख कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी को घटाकर 51 प्रतिशत तक लाया जाए।
वर्तमान में रेलवे की कई सहायक कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी काफी अधिक है। वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉर्पोरेशन (IRFC) में सरकार की हिस्सेदारी 86.36% है। इसके अलावा, रेल विकास निगम (72.84%), राइट्स (73%), इरकॉन इंटरनेशनल (65.17%) और रेलटेल (65.17%) जैसी कंपनियों में भी सरकार अपनी हिस्सेदारी घटाकर 51% करने की योजना बना रही है। हालांकि, विशेषज्ञ मान रहे हैं कि केवल 15 से 20 प्रतिशत शेयर बेचकर 1 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य तक पहुंचना मुश्किल होगा, क्योंकि रेलवे कंपनियों में सरकार की कुल हिस्सेदारी की वैल्यू करीब 4.5 लाख करोड़ रुपये है।
शेयर बेचने के अलावा, सरकार रेलवे की भौतिक संपत्तियों (Physical Assets) का भी मुद्रीकरण करना चाहती है। देश भर के 17 रेलवे जोनों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपनी ऐसी जमीनों, बिल्डिंग्स, गोदामों और हाउसिंग कॉलोनियों की सूची तैयार करें जिनका व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा सकता है। जिन जमीनों का फिलहाल उपयोग नहीं हो रहा है, उन्हें निजी हाथों में बेचने या लंबी अवधि के लिए लीज पर देने का प्रस्ताव है। रेलवे के वेयरहाउस, ऑफिस और स्टेशन परिसर के कमर्शियल डेवलपमेंट के जरिए फंड जुटाने की तैयारी है।
जानकारों का मानना है कि मोदी सरकार की इस जल्दबाजी के पीछे आठवां वेतन आयोग (8th Pay Commission) एक बड़ी वजह है। वेतन आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी 2026 से लागू होनी हैं, जिसके कारण सरकार को कर्मचारियों के एरियर और संशोधित वेतन के लिए भारी राशि की आवश्यकता होगी। अनुमान है कि इस मद में सरकार को करीब 4.5 लाख करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ेंगे। वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकारों का कुल वेतन और पेंशन बिल लगभग 25 लाख करोड़ रुपये है, जो आठवें वेतन आयोग के बाद और बढ़ जाएगा। इसी वित्तीय बोझ को संभालने के लिए सरकार पुरानी संपत्तियों को बेचने का रास्ता चुन रही है।
विपक्ष ने सरकार के इस कदम की तीखी आलोचना शुरू कर दी है। आलोचकों का तर्क है कि मोदी सरकार पूर्ववर्ती नेहरू और इंदिरा गांधी सरकारों द्वारा बनाई गई संपत्तियों और संस्थानों को बेचकर अल्पकालिक वित्तीय संकट दूर करने की कोशिश कर रही है। निजीकरण के इस मॉडल पर सवाल उठाते हुए विपक्षी दलों का कहना है कि यह देश की रणनीतिक संपत्तियों को निजी पूंजीपतियों के हवाले करने जैसा है। हालांकि, सरकार का पक्ष है कि यह ‘एसेट मोनेटाइजेशन’ है, जिससे निष्क्रिय पड़ी संपत्तियों से राजस्व जुटाकर नए इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया जाएगा।
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