Ram Mandir Donation : ज्योतिष पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती इन दिनों ‘गौमाता’ को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा दिलाने के संकल्प के साथ देशव्यापी यात्रा पर हैं। इसी क्रम में वे बागपत के बड़ौत स्थित कोताना रोड पहुंचे, जहां सर्व समाज उत्थान समिति के तत्वावधान में उनका भव्य स्वागत हुआ। शंकराचार्य ने इस दौरान जोर देकर कहा कि गौमाता केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय संस्कृति, सामाजिक परंपराओं और हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। उन्होंने आम जनमानस से आह्वान किया कि गौ संरक्षण को केवल एक नारे तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाएं।

‘राष्ट्रमाता’ के दर्जे के लिए राजनीतिक दबाव की अपील
शंकराचार्य ने अपनी यात्रा के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वे अब तक देश के लगभग 200 विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर चुके हैं और जनता से सीधा संवाद स्थापित कर रहे हैं। उन्होंने जनता को स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि आगामी चुनावों में मतदाताओं को केवल उन्हीं उम्मीदवारों को वोट देना चाहिए, जो गौमाता के प्रति प्रतिबद्ध हों। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपने प्रतिनिधियों पर ‘गौमाता को राष्ट्रमाता घोषित करने’ के लिए लगातार दबाव बनाएं। शंकराचार्य का मानना है कि जब तक जनभावनाओं को राजनीतिक इच्छाशक्ति में नहीं बदला जाएगा, तब तक गौ संरक्षण का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।

राम मंदिर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
बड़ौत प्रवास के दौरान राम मंदिर ट्रस्ट को लेकर पूछे गए एक तीखे सवाल पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपनी बेबाक राय रखी। उन्होंने मंदिर प्रबंधन में हो रही अनियमितताओं और चोरी जैसी घटनाओं पर तंज कसते हुए कहा कि यह सब तो अपेक्षित ही था। उन्होंने आरोप लगाया कि मंदिर निर्माण के दौरान चार शंकराचार्यों और 13 अखाड़ों के प्रमुखों की अनदेखी की गई और ट्रस्ट में केवल ‘अपने खास लोगों’ को स्थान दिया गया। उन्होंने कहा, “पूत के लक्षण पालने में दिख जाते हैं। जिस दिन विशेषज्ञों को हटाकर ट्रस्ट में अपनों को बैठाया गया, उसी दिन यह स्पष्ट हो गया था कि वहां क्या होने वाला है।” उन्होंने ट्रस्ट की व्यवस्थाओं को सनातन परंपराओं के अनुकूल न मानकर उसे एक सोची-समझी नीति बताया।
सनातन परंपरा और राजनीतिक हिंदुत्व का अंतर
अविमुक्तेश्वरानंद स्वामी ने ‘सनातन परंपरा’ और आज के ‘राजनीतिक हिंदुत्व’ के बीच के बारीक अंतर को भी समझाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका गौ-सेवा अभियान किसी विवाद को जन्म देने के लिए नहीं है, बल्कि समाज में चेतना जगाने और भारतीय संस्कृति की मौलिक जड़ों को सुरक्षित रखने के लिए है। उन्होंने कहा कि धर्म को जब राजनीति के चश्मे से देखा जाता है, तो उसके मूल अर्थ बदल जाते हैं। शंकराचार्य के इस दौरे ने बड़ौत और आसपास के क्षेत्रों में राजनीतिक एवं धार्मिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। उनकी यह यात्रा सनातन मूल्यों की रक्षा और गौमाता के प्रति जन-जागृति का एक बड़ा माध्यम बनती जा रही है, जो भविष्य में एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकती है।
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