Congress Future : भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में क्षेत्रीय दलों के भविष्य को लेकर एक गहन और महत्वपूर्ण बहस छिड़ गई है। पिछले कुछ समय में महाराष्ट्र में एनसीपी और शिवसेना, तथा पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) जैसे प्रमुख क्षेत्रीय दलों के भीतर मची कलह और बगावत ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या ये दल अपने अस्तित्व के संकट से गुजर रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन दलों का कमजोर होना भारतीय राजनीति की दिशा बदल सकता है। एक बड़ा सवाल यह है कि इन दलों की कमजोरी का अंततः किसे लाभ होगा—क्या यह कांग्रेस की वापसी का मार्ग प्रशस्त करेगा, या फिर इसका सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जैसी राष्ट्रीय पार्टियों को मिलेगा?
कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का पुराना राजनीतिक रिश्ता
ऐतिहासिक रूप से, अधिकांश क्षेत्रीय दलों का उदय कांग्रेस के ही गर्भ से हुआ है। ये दल लंबे समय तक सेकुलर राजनीति और स्थानीय मुद्दों का हवाला देकर कांग्रेस का वोट बैंक हथियाकर अपने राज्यों में मजबूत होते गए, जिसके परिणामस्वरूप कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर होती गई। हालांकि, आज विपक्षी एकता की अनिवार्यता और भाजपा की बढ़ती राष्ट्रीय चुनौती ने इन क्षेत्रीय दलों को नए विकल्पों पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री के अनुसार, यदि क्षेत्रीय दलों का जनाधार खिसकता है, तो कांग्रेस के पास राष्ट्रीय विपक्ष की मुख्य धुरी बनने का अवसर है, लेकिन यह सफलता राज्यों की विशिष्ट राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
क्या विपक्षी राजनीति का केंद्र फिर से बन पाएगी कांग्रेस?
कांग्रेस पार्टी इस राजनीतिक उथल-पुथल में खुद को फिर से स्थापित करने के अवसर देख रही है। पिछले उदाहरणों पर गौर करें तो केरल में वाम दलों का प्रभाव कम होने, तेलंगाना में बीआरएस (BRS) और कर्नाटक में जेडीएस (JDS) की कमजोरी का सीधा लाभ कांग्रेस को मिला है। कांग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक का कहना है कि हर राजनीतिक दल का प्राथमिक लक्ष्य स्वयं को मजबूत करना होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस अन्य दलों के प्रति ‘ठगबंधन’ जैसी नकारात्मक राजनीति में विश्वास नहीं रखती। बिहार जैसे राज्यों में जारी गठबंधन यह संकेत देते हैं कि कांग्रेस अब क्षेत्रीय दलों को पूरी तरह से दरकिनार करने के बजाय उनके साथ तालमेल बैठाकर अपनी जड़ों को गहरा करना चाहती है।
संगठन और नेतृत्व के बिना कांग्रेस के लिए चुनौतियां बरकरार
यह कहना जल्दबाजी होगी कि सिर्फ क्षेत्रीय दलों की कमजोरी ही कांग्रेस को ‘संजीवनी’ दे देगी। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की संभावनाओं के बीच यह स्पष्ट है कि क्षेत्रीय दल अभी भी पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुए हैं। कांग्रेस की असली मजबूती उसकी संगठनात्मक संरचना, नेतृत्व की स्पष्टता और राज्यों में जनाधार बढ़ाने की उसकी अपनी क्षमता पर टिकी होगी। यदि कांग्रेस केवल दूसरे दलों के बिखरने का इंतजार करती है, तो वह भाजपा के लिए राह आसान कर सकती है, जो राष्ट्रीय दलों के बीच सीधा मुकाबला होने पर अक्सर लाभ की स्थिति में रहती है।
‘विलय’ की राजनीति और कांग्रेस का सधा हुआ रुख
वर्तमान में कांग्रेस नेतृत्व काफी सधे हुए अंदाज में आगे बढ़ रहा है। उन्हें भली-भांति ज्ञात है कि क्षेत्रीय दलों के नेतृत्व में आज जो अनिश्चितता है, उसे भुनाने के लिए ‘दादागिरी’ नहीं, बल्कि ‘समावेशी’ दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इसीलिए, कांग्रेस संगठन के शीर्ष पदों पर बैठे नेताओं ने यह संकेत दिया है कि जो दल अतीत में कांग्रेस से अलग हुए थे, यदि वे अब पुनः विलय करना चाहते हैं, तो पार्टी उनका सहर्ष स्वागत करेगी। यह संदेश स्पष्ट है कि कांग्रेस खुद को एक ऐसी छतरी के रूप में पेश करना चाहती है, जिसके नीचे सभी विपक्षी दल मिलकर भाजपा की चुनौतियों का सामना कर सकें, बशर्ते वे कांग्रेस की राष्ट्रीय भूमिका को स्वीकार करें।
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