Rizka Farming : पशुपालन करने वाले किसानों के सामने सालभर पौष्टिक हरे चारे की उपलब्धता बनाए रखना बड़ी चुनौती होती है। खासकर गर्मी और चारा संकट के समय पशुओं के लिए पर्याप्त हरा चारा जुटाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में रिजका की खेती किसानों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकती है। रिजका को लूसर्न के नाम से भी जाना जाता है और इसे चारा फसलों की रानी कहा जाता है। यह पौष्टिक चारा उपलब्ध कराने के साथ पशुपालकों के खर्च को भी कम करने में मदद कर सकती है।
अक्टूबर से दिसंबर तक कर सकते हैं रिजका की बुवाई
रिजका की बुवाई के लिए अक्टूबर से दिसंबर के पहले सप्ताह तक का समय उपयुक्त माना जाता है। लाइन से बुवाई करने पर प्रति हेक्टेयर करीब 12 से 15 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। वहीं छिड़काव विधि से बुवाई करने पर बीज की मात्रा बढ़कर लगभग 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो जाती है। बुवाई से पहले खेत की अच्छी तैयारी करना और मिट्टी की स्थिति के अनुसार खाद एवं उर्वरक का इस्तेमाल करना जरूरी होता है।
जल निकासी वाली मिट्टी में अच्छी होती है पैदावार
रिजका की खेती के लिए ऐसी मिट्टी बेहतर मानी जाती है, जिसमें पानी का निकास आसानी से हो सके। सामान्य पीएच वाली मिट्टी में यह फसल अच्छी तरह विकसित हो सकती है। अगर खेत की मिट्टी अम्लीय है, तो कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार उसमें चूने का इस्तेमाल करके रिजका की खेती की जा सकती है। खेत की मिट्टी की जांच कराने के बाद ही आवश्यक सुधार करना किसानों के लिए अधिक उपयोगी रहेगा।
कम तापमान में भी तेजी से विकसित होती है रिजका
रिजका की एक खासियत यह भी है कि यह कम तापमान में भी अच्छी तरह बढ़ सकती है। यही कारण है कि सर्दियों के मौसम में पशुपालकों के लिए यह लंबे समय तक हरे चारे का स्रोत बनी रह सकती है। बरसीम की तुलना में इसकी कटाई का लंबा चक्र किसानों को लगातार हरा चारा उपलब्ध कराने में मदद करता है। पशुपालन करने वाले किसान इसे अपने चारा प्रबंधन का हिस्सा बना सकते हैं।
एक बार बुवाई के बाद कई बार मिलती है कटाई
रिजका की खेती का सबसे बड़ा फायदा इसकी बार-बार कटाई की क्षमता है। अनुकूल परिस्थितियों में किसान एक साल में करीब 8 से 10 बार तक इसकी कटाई कर सकते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, प्रति हेक्टेयर लगभग 80 से 120 टन हरा चारा और करीब 18 से 20 टन सूखा चारा प्राप्त हो सकता है। अच्छी देखभाल होने पर एक बार बोई गई फसल करीब तीन साल तक कटाई देती रह सकती है।
कम लागत में चारे से अतिरिक्त आय का अवसर
प्रति बीघा रिजका की खेती पर लगभग 8,000 से 12,000 रुपये तक लागत आने का अनुमान बताया जाता है। इसमें बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी जैसे खर्च शामिल हो सकते हैं। यदि एक बीघा से 20 से 25 टन चारा मिलता है और इसे 300 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास बेचा जाए, तो सकल बिक्री लगभग 60,000 से 75,000 रुपये तक हो सकती है। वास्तविक आय स्थानीय बाजार भाव और उत्पादन पर निर्भर करेगी।
अपने पशुओं को खिलाने पर चारा खरीदने का खर्च बचेगा
रिजका को किसान बाजार में बेचने के बजाय अपने पशुओं को भी खिला सकते हैं। इससे बाहर से हरा चारा खरीदने पर होने वाला खर्च कम किया जा सकता है। कुछ अनुमानित परिस्थितियों में पशुपालक प्रति बीघा 30,000 से 50,000 रुपये तक के चारा खर्च की बचत कर सकते हैं। हालांकि, वास्तविक बचत पशुओं की संख्या, चारा जरूरत और स्थानीय कीमतों पर निर्भर करेगी।
प्रोटीनयुक्त चारा दूध उत्पादन में कर सकता है मदद
रिजका में प्रोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत अच्छी बताई जाती है, इसलिए इसे पशुओं के लिए पौष्टिक चारा माना जाता है। संतुलित पशु आहार के हिस्से के रूप में इसका इस्तेमाल पशुओं की पोषण जरूरत पूरी करने में मदद कर सकता है। दूध उत्पादन पर असर पशु की नस्ल, स्वास्थ्य, आहार, दुग्ध अवस्था और प्रबंधन जैसी कई परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
बड़े स्तर पर खेती से बढ़ सकता है किसानों का फायदा
अगर किसान के पास पर्याप्त जमीन और पशुधन है, तो रिजका की खेती बड़े स्तर पर की जा सकती है। 2 से 3 बीघा में उत्पादन बढ़ाकर किसान अपने पशुओं के लिए सालभर चारे की जरूरत पूरी करने के साथ अतिरिक्त चारा बेचने का विकल्प भी रख सकते हैं। हालांकि, खेती शुरू करने से पहले स्थानीय मिट्टी, पानी, बाजार भाव, पशुओं की संख्या और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के आधार पर लागत व संभावित आय का आकलन करना बेहतर रहेगा।
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