Rupee vs Dollar
Rupee vs Dollar: भारतीय मुद्रा के लिए शुक्रवार का दिन बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। वैश्विक आर्थिक उथल-पुथल और घरेलू बाजार में सुस्ती के बीच डॉलर के मुकाबले रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर फिसल गया। दिन के कारोबार के दौरान एक समय ऐसा आया जब रुपया 92.02 प्रति डॉलर के स्तर को छू गया। हालांकि, सत्र के अंत में मामूली रिकवरी देखी गई और यह 91.97 पर बंद हुआ। इस गिरावट ने भारतीय अर्थव्यवस्था और आयातकों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
विदेशी मुद्रा बाजार में शुक्रवार को रुपये की शुरुआत अपेक्षाकृत ठीक रही थी। रुपया 91.89 पर खुला और मांग बढ़ने के कारण शुरुआती सत्र में यह 91.82 तक मजबूत हुआ। लेकिन यह बढ़त क्षणिक साबित हुई। जैसे-जैसे दिन चढ़ा, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और मजबूत डॉलर इंडेक्स ने रुपये पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। अंततः, इसने 92.02 का ऐतिहासिक निचला स्तर छुआ। इससे पहले 23 जनवरी को रुपया 92 के स्तर पर पहुँचा था, लेकिन शुक्रवार की गिरावट ने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये की इस कमजोरी के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारक जिम्मेदार हैं। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) द्वारा भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसा निकालना सबसे प्रमुख कारण रहा। इसके अलावा, अमेरिका में राजनीतिक गतिविधियों, विशेषकर डोनाल्ड ट्रंप द्वारा फेडरल रिजर्व के अगले चेयरमैन की नियुक्ति के संकेतों ने डॉलर को और मजबूती दी है। डॉलर इंडेक्स 0.45% की बढ़त के साथ 96.57 पर पहुँच गया, जिससे रुपये जैसी उभरती हुई मुद्राओं के लिए टिकना मुश्किल हो गया।
संसद में पेश किए गए ताजा आर्थिक सर्वेक्षण में भी रुपये की स्थिति पर गंभीर टिप्पणी की गई है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारतीय रुपया अपनी वास्तविक क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब देश में महंगाई दर नियंत्रण में है और विकास दर के सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं, तब निवेशकों की यह हिचकिचाहट और रुपये का गिरना चिंता का विषय है। सरकार और नीति निर्माताओं को विदेशी निवेश को स्थिर करने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
रुपये के लिए एकमात्र राहत की खबर कच्चे तेल के बाजार से आई। अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड वायदा में 0.96% की गिरावट देखी गई, जिससे यह 70.03 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड करता दिखा। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से भारत के आयात बिल में थोड़ी कमी आती है, जिससे रुपये को और अधिक फिसलने से रोकने में मदद मिलती है। हालांकि, डॉलर की तुलना में यह राहत बहुत कम रही।
मिराए एसेट शेयरखान के विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में रुपये की चाल काफी हद तक अमेरिकी आर्थिक नीतियों और वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता पर निर्भर करेगी। यदि विदेशी निवेशकों की निकासी जारी रहती है, तो रुपये पर दबाव और बढ़ सकता है। फिलहाल, 92 का स्तर एक मनोवैज्ञानिक बाधा बन गया है। अब बाजार की नजरें भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के हस्तक्षेप पर टिकी हैं कि वह रुपये को संभालने के लिए क्या कदम उठाता है।
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