छत्तीसगढ़

एसईसीएल पर वैधानिक छल का आरोप, अमेरा माइन्स परियोजना निरस्त करने की मांग

Ambikapur News : सरगुजा में प्रस्तावित अमेरा ओपन कास्ट माइन्स परियोजना को लेकर विरोध अब सियासी और संवैधानिक मोर्चे पर तेज हो गया है। जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष आदित्येश्वर शरण सिंह देव ने सरगुजा कलेक्टर को पत्र लिखकर न केवल इस परियोजना को तत्काल निरस्त करने की अनुशंसा की मांग की है, बल्कि ग्राम परसोड़ीकला में ग्रामीणों पर हुए बल प्रयोग को संविधान, कानून और मानवाधिकारों के विरुद्ध बताते हुए कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने एसईसीएल (SECL) पर विस्थापित आदिवासियों के साथ वैधानिक प्रावधानों की अनदेखी, मुआवजे में भारी अनियमितता और अधिकारों को छिपाने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।

संवाद की जगह बल प्रयोग दुर्भाग्यपूर्ण

आदित्येश्वर सिंह देव ने कहा कि 3 दिसंबर 2025 को परसोड़ीकला में हुई हिंसक झड़प पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे प्रशासन की विफलता बताया। उन्होंने कहा कि पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र में, जहाँ ग्रामीणों के संवैधानिक अधिकार सर्वोपरि हैं, वहाँ संवाद और विश्वास बहाली के बजाय बल प्रयोग का मार्ग चुनना अत्यंत निंदनीय है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ग्रामीणों का विरोध केवल अपनी पूर्वजों की भूमि और अधिकारों को बचाने के लिए है।

कानून और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना

पत्र में उल्लेख किया है कि एसईसीएल द्वारा ‘ग्राम सभा’ की स्वतंत्र और सूचित सहमति के बिना इस परियोजना को थोपा जा रहा है, जो सर्वोच्च न्यायालय के ‘समता जजमेंट’ और ‘वन अधिकार अधिनियम’ का खुला उल्लंघन है। सिंह देव ने ‘महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड बनाम मैथिस उरांव (2025)’ के ऐतिहासिक निर्णय का हवाला देते हुए बताया कि एसईसीएल मुआवजा देने में पुराने नियमों का सहारा ले रही है, जबकि कानूनन मुआवजा वर्तमान दरों पर मिलना चाहिए।

मुआवजे में करोड़ों की विसंगति

आदित्येश्वर सिंह देव ने साक्ष्यों के साथ बताया कि SECL ‘LARR अधिनियम 2013’ की अनदेखी कर पुराने दरों पर मुआवजा तय कर रहा है। गणना के अनुसार, मुख्य मार्ग की भूमि का वास्तविक मूल्य ब्याज सहित लगभग 91.97 लाख रुपये प्रति एकड़ बनता है, जबकि एसईसीएल केवल कुछ लाख रुपये की पेशकश कर रहा है।

विस्थापितों के साथ वैधानिक धोखाधड़ी

पत्र के माध्यम से कहा है कि SECL ने ‘कोल इंडिया एन्युटी स्कीम 2020’ के प्रावधानों को जानबूझकर छिपाया है, जो विस्थापितों को ₹15,000 से ₹30,000 मासिक पेंशन का अधिकार देती है। साथ ही, ‘भूमि के बदले भूमि’ (Land for Land) के वैधानिक अधिकार को भी नकार दिया गया है। सिंह देव ने कलेक्टर से इस विस्थापन को रोकने और परियोजना को रद्द करने की अनुशंसा करने का आग्रह किया है।

विस्थापन का भयावह सच

अमेरा गाँव के पुराने विस्थापितों की स्थिति का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि पिपरधस्का में बसाए गए 50 परिवार आज भी पक्की सड़क और शुद्ध पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं के बिना नरकीय जीवन जी रहे हैं।

आदित्येश्वर सिंह देव ने 3 दिसंबर 2025 की हिंसा की निंदा करते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि एक ओर सरकार सौर ऊर्जा का ढोंग रचकर आम जनता के घरों के बिजली बिलों से सब्सिडी समाप्त कर रही है, वहीं दूसरी ओर आदिवासियों की मर्जी के खिलाफ प्रशासनिक बल (Police Force) का प्रयोग कर नई कोयला खदानें थोप रही है। यह सरकार का दोहरा चरित्र है कि भविष्य की ऊर्जा (Solar Energy) के नाम पर जनता की जेब काटी जा रही है और वर्तमान में वनों व समुदायों को उजाड़कर कोयला खनन को बढ़ावा दिया जा रहा है।

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