Sarita Khanchandani: महाराष्ट्र की प्रख्यात समाजसेविका और एडवोकेट सरिता खानचंदानी ने गुरुवार दोपहर आत्महत्या कर ली। वे ठाणे जिले के उल्हासनगर में स्थित अपने घर की सातवीं मंजिल से कूद गईं, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गईं। इलाज के लिए उन्हें डोंबिवली के अस्पताल में भर्ती किया गया, जहां उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।इस हृदयविदारक घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिससे क्षेत्र में शोक और आक्रोश दोनों व्याप्त हैं।

समाजसेवा से पहचान बनाने वाली सरिता
सरिता खानचंदानी न केवल पेशे से एक वकील थीं, बल्कि उन्होंने हीराली फाउंडेशन के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में सक्रिय योगदान दिया। वे उल्हासनगर और आसपास के क्षेत्रों में जल और वायु प्रदूषण के खिलाफ अभियान चला रही थीं। खासतौर पर उल्हास और वालधुनी नदियों की सफाई और संरक्षण के लिए उन्होंने कई आंदोलन किए थे। उन्होंने महाराष्ट्र में डीजे संस्कृति पर रोक लगाने में भी अहम भूमिका निभाई थी, जिससे उन्हें कई विरोधों का सामना करना पड़ा था।

आत्महत्या से पहले का विवाद
डिप्टी पुलिस कमिश्नर सचिन गोरे के अनुसार, सरिता खानचंदानी ने अपने ऑफिस के पीछे एक कमरा एक महिला को किराए पर दिया था। बुधवार को उस महिला से कमरे को खाली करने को लेकर विवाद हुआ था। इस झगड़े के बाद महिला ने सरिता पर मारपीट का मामला दर्ज कराया था। माना जा रहा है कि इसी मानसिक दबाव के कारण सरिता ने यह कदम उठाया।
समाज में शोक और सवाल
सरिता की आत्महत्या ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या एक समाजसेविका, जो पर्यावरण और सामाजिक न्याय के लिए लड़ रही थी, उसे पर्याप्त सुरक्षा और समर्थन मिला? क्या पुलिस या स्थानीय प्रशासन मानसिक तनाव की स्थिति में उचित हस्तक्षेप कर सकता था?
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरिता लगातार दबाव और धमकियों का सामना कर रही थीं। उन्हें कई बार उनके अभियानों के कारण राजनीतिक और सामाजिक ताकतों से विरोध झेलना पड़ा। सरिता खानचंदानी की असमय मृत्यु ने समाज में एक गंभीर शून्य पैदा कर दिया है। उनकी लड़ाई सिर्फ पर्यावरण या कानूनी सुधारों तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे एक बेहतर और न्यायसंगत समाज की आवाज थीं। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में कितनी गंभीरता से जांच करता है और ऐसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को कैसे संरक्षण देता है।
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