Dhar Bhojshala : सुप्रीम कोर्ट ने भोजशाला में नमाज की इजाजत ठुकराई, आसपास व्यवस्था और ढांचा सुरक्षित रखने का आदेश

भोजशाला परिसर में नमाज की अनुमति को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने परिसर के भीतर नमाज की इजाजत देने से इनकार करते हुए प्रशासन को आसपास वैकल्पिक व्यवस्था करने का निर्देश दिया है। साथ ही साफ कहा कि विवादित ढांचे में किसी भी तरह का बदलाव नहीं होगा। आखिर इस फैसले का सबसे बड़ा असर किस पर पड़ेगा, जानिए पूरी खबर।

Dhar Bhojshala : धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर को लेकर चल रहे लंबे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस मोहना की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट निर्देश दिया है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) भोजशाला परिसर के भीतर किसी भी प्रकार का ढांचागत बदलाव (Structural Changes) नहीं करेगा। यह आदेश मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए दिया गया है, ताकि किसी भी पक्ष के दावों को अंतिम निर्णय से पहले नुकसान न पहुँचे।

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शुक्रवार की नमाज: क्या है सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम प्रस्ताव?

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान शुक्रवार की नमाज के मुद्दे पर एक अंतरिम व्यवस्था का प्रस्ताव रखा है। चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि क्या भोजशाला के आसपास नमाजियों के लिए कोई वैकल्पिक खुली जगह चिन्हित की जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि जब तक इस जटिल मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक एक अंतरिम व्यवस्था आवश्यक है। ज्ञात हो कि कोर्ट ने परिसर के भीतर शुक्रवार की नमाज पर लगी रोक को फिलहाल बरकरार रखा है, लेकिन इसके विकल्प के तौर पर हर शुक्रवार दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच आसपास किसी सुरक्षित स्थान पर नमाज पढ़ने की अनुमति देने पर विचार किया जा रहा है।

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मुस्लिम पक्ष की दलील: 40 साल पुरानी स्थिति बहाल करने की मांग

सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी और अभिषेक मनु सिंघवी ने अपनी बात प्रमुखता से रखी। उन्होंने कोर्ट को बताया कि मुस्लिम समुदाय वहां वर्ष 1935 से नमाज पढ़ता आ रहा है और पिछले 40 वर्षों से यह प्रक्रिया निर्बाध रूप से चल रही थी। उन्होंने आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के हालिया फैसले ने अचानक इस लंबे समय से चली आ रही यथास्थिति (Status Quo) को समाप्त कर दिया है। मुस्लिम पक्ष का तर्क है कि इस अचानक आए आदेश ने उन्हें परिसर से पूरी तरह बाहर कर दिया है, जो उनके धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है।

हाईकोर्ट के ‘वाग्देवी प्रतिमा’ आदेश पर सर्वोच्च अदालत को आपत्ति

इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू वह आदेश रहा, जिसमें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने लंदन के संग्रहालय से वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा को भारत वापस लाने की बात कही थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की। जस्टिस जॉयमाला बागची ने तीखे सवाल पूछते हुए कहा कि कोई भी संवैधानिक अदालत इस तरह का आदेश कैसे पारित कर सकती है जो अधिकार क्षेत्र से बाहर लगता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश की वैधानिकता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, जिसे इस मामले का एक प्रमुख कानूनी मोड़ माना जा रहा है।

अगली सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया का आधार

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की अपील को गंभीरता से लेते हुए हिंदू पक्ष, मध्य प्रदेश राज्य सरकार, जिला मजिस्ट्रेट (DM) और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को नोटिस जारी किया है। सभी पक्षों को इस मामले में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मामले की अगली सुनवाई जुलाई के तीसरे हफ्ते में होगी। कोर्ट ने फिलहाल हाईकोर्ट के संपूर्ण फैसले पर रोक लगाने से इनकार किया है, लेकिन यह सुनिश्चित किया है कि सुनवाई के दौरान सभी पक्षों की दलीलों को समान महत्व दिया जाए।

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ऐतिहासिक संदर्भ और संवेदनशीलता

धार की भोजशाला का मुद्दा लंबे समय से न्यायिक और सामाजिक विमर्श का केंद्र रहा है। यह स्थान न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि पुरातात्विक महत्व का भी है। सुप्रीम कोर्ट की यह कोशिश है कि कानून का शासन बना रहे और साथ ही दोनों पक्षों की धार्मिक भावनाओं को न्यूनतम क्षति पहुँचे। कोर्ट ने अतीत में बसंत पंचमी के दौरान की गई अंतरिम व्यवस्थाओं का हवाला देते हुए संतुलन बनाने का संकेत दिया है। फिलहाल, पूरी कानूनी बिरादरी और संबंधित पक्षों की नजरें जुलाई में होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जो इस दशकों पुराने विवाद की दिशा तय करेगी।

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Chandan Das

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