Supreme Court ED remark: प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्यशैली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने ईडी द्वारा मामलों में दोष साबित हुए बिना भी आरोपियों को लंबे समय तक हिरासत में रखने पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत ने इस प्रवृत्ति को ‘खतरनाक’ और ‘न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग’ बताया।
दोषसिद्धि दर सिर्फ़ 0.1 फीसदी
मुख्य न्यायाधीश गवई ने 2024-25 के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि ईडी द्वारा दायर मामलों में सिर्फ 0.1% मामलों में ही दोष सिद्ध हो पाया है, जबकि हिरासत में रखे गए व्यक्तियों की संख्या कहीं अधिक है। उन्होंने स्पष्ट कहा, “जब दोष सिद्ध ही नहीं होता, तब किसी व्यक्ति को वर्षों तक हिरासत में रखना गंभीर चिंता का विषय है।”
भूषण पावर एंड स्टील से जुड़ा मामला बना कारण
यह टिप्पणी उस समय आई जब जेएसडब्ल्यू सीमेंट द्वारा भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड के अधिग्रहण से संबंधित एक मामले की सुनवाई हो रही थी। सुनवाई के दौरान वकील ने कहा कि भूषण पावर के खिलाफ ईडी की जांच अब भी जारी है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “क्या यहां भी ईडी आ गई है?” – यह बयान अदालत की नाराजगी को दर्शाने के लिए काफी था।
केंद्र सरकार की दलील पर जवाब
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि ईडी ने वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामलों में अब तक ₹23,000 करोड़ की रिकवरी की है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सोशल मीडिया पर ईडी के खिलाफ झूठे वीडियो फैलाए जा रहे हैं। लेकिन अदालत ने साफ कर दिया कि “हम यूट्यूब वीडियो या अखबारों के आधार पर निर्णय नहीं लेते, हम न्याय के सिद्धांतों के आधार पर चलते हैं।”
सुप्रीम कोर्ट की पुरानी टिप्पणियाँ भी बनीं मुद्दा
इससे पहले भी, सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर ईडी की आलोचना की है, खासतौर पर राजनीतिक मामलों में एजेंसी के उपयोग को लेकर। पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजय खन्ना ने कहा था कि ईडी लगातार ऐसे मामलों में आरोपपत्र दायर कर रही है, जिनमें ठोस साक्ष्य नहीं हैं। केजरीवाल और सिसोदिया को ज़मानत देते समय भी अदालत ने ईडी की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक बार फिर कानून के दुरुपयोग और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन पर बहस को तेज कर सकती है। ईडी की शक्तियों और जिम्मेदारियों पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं कि कहीं यह एजेंसी सरकार के हितों की पूर्ति का औजार तो नहीं बन रही?
Read More : Kohli Rohit comeback: कोहली-रोहित की धमाकेदार वापसी तय! 19 अक्टूबर से ऑस्ट्रेलिया में होगा बड़ा मुकाबला
Supreme Court ED remark : ईडी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘दोष साबित नहीं, फिर भी हिरासत में रखना गलत’
Supreme Court ED remark: प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्यशैली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने ईडी द्वारा मामलों में दोष साबित हुए बिना भी आरोपियों को लंबे समय तक हिरासत में रखने पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत ने इस प्रवृत्ति को ‘खतरनाक’ और ‘न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग’ बताया।
दोषसिद्धि दर सिर्फ़ 0.1 फीसदी
मुख्य न्यायाधीश गवई ने 2024-25 के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि ईडी द्वारा दायर मामलों में सिर्फ 0.1% मामलों में ही दोष सिद्ध हो पाया है, जबकि हिरासत में रखे गए व्यक्तियों की संख्या कहीं अधिक है। उन्होंने स्पष्ट कहा, “जब दोष सिद्ध ही नहीं होता, तब किसी व्यक्ति को वर्षों तक हिरासत में रखना गंभीर चिंता का विषय है।”
भूषण पावर एंड स्टील से जुड़ा मामला बना कारण
यह टिप्पणी उस समय आई जब जेएसडब्ल्यू सीमेंट द्वारा भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड के अधिग्रहण से संबंधित एक मामले की सुनवाई हो रही थी। सुनवाई के दौरान वकील ने कहा कि भूषण पावर के खिलाफ ईडी की जांच अब भी जारी है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “क्या यहां भी ईडी आ गई है?” – यह बयान अदालत की नाराजगी को दर्शाने के लिए काफी था।
केंद्र सरकार की दलील पर जवाब
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि ईडी ने वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामलों में अब तक ₹23,000 करोड़ की रिकवरी की है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सोशल मीडिया पर ईडी के खिलाफ झूठे वीडियो फैलाए जा रहे हैं। लेकिन अदालत ने साफ कर दिया कि “हम यूट्यूब वीडियो या अखबारों के आधार पर निर्णय नहीं लेते, हम न्याय के सिद्धांतों के आधार पर चलते हैं।”
सुप्रीम कोर्ट की पुरानी टिप्पणियाँ भी बनीं मुद्दा
इससे पहले भी, सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर ईडी की आलोचना की है, खासतौर पर राजनीतिक मामलों में एजेंसी के उपयोग को लेकर। पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजय खन्ना ने कहा था कि ईडी लगातार ऐसे मामलों में आरोपपत्र दायर कर रही है, जिनमें ठोस साक्ष्य नहीं हैं। केजरीवाल और सिसोदिया को ज़मानत देते समय भी अदालत ने ईडी की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक बार फिर कानून के दुरुपयोग और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन पर बहस को तेज कर सकती है। ईडी की शक्तियों और जिम्मेदारियों पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं कि कहीं यह एजेंसी सरकार के हितों की पूर्ति का औजार तो नहीं बन रही?
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