Surguja School Row: छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले से एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जहाँ एक निजी प्री-प्राइमरी स्कूल ने एक मासूम बच्चे को सिर्फ इसलिए दाखिला देने से मना कर दिया क्योंकि वह अपनी मातृभाषा ‘सरगुजिहा’ बोलता है। इस घटना ने न केवल स्थानीय लोगों को आक्रोशित किया है, बल्कि प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में भी हलचल मचा दी है। शिक्षा के अधिकार और क्षेत्रीय भाषा के सम्मान को लेकर अब एक नई बहस छिड़ गई है।

क्या है पूरा मामला: सरगुजिहा बोली बनी बाधा
राजकुमार यादव अपने बेटे सत्यम का दाखिला कराने के लिए चोपड़ापारा स्थित ‘स्वरंग किड्स एकेडमी’ पहुंचे थे। प्रक्रिया के दौरान जब स्कूल के शिक्षकों और प्राचार्य ने बच्चे से कुछ सामान्य सवाल पूछे, तो सत्यम ने अपनी सहज सरगुजिहा बोली में जवाब दिया। इसके बाद स्कूल प्रबंधन ने जो तर्क दिया, वह बेहद आपत्तिजनक था। स्कूल ने यह कहते हुए दाखिला देने से इनकार कर दिया कि यहाँ “बड़े घरों के बच्चे” पढ़ते हैं और यदि सत्यम यहाँ पढ़ेगा, तो दूसरे बच्चे भी उसकी क्षेत्रीय भाषा सीख जाएंगे। स्कूल का यह व्यवहार सामाजिक भेदभाव और भाषाई संकीर्णता का स्पष्ट उदाहरण पेश करता है।
परिजनों की निराशा और मासूम की शिक्षा का सवाल
बच्चे के पिता राजकुमार यादव इस घटना से काफी आहत हैं। उन्होंने बताया कि उनके घर में सभी सदस्य सरगुजिहा बोली का ही प्रयोग करते हैं, जिससे उनका बेटा अभी केवल इसी भाषा को समझता और बोलता है। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि स्कूल के वातावरण में रहकर सत्यम धीरे-धीरे हिंदी और अंग्रेजी सीख जाएगा, लेकिन स्कूल ने बच्चे की सीखने की क्षमता को प्रोत्साहित करने के बजाय उसकी जड़ यानी उसकी मातृभाषा को ही प्रवेश न देने का आधार बना लिया।
पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव का सख्त रुख
इस मामले पर कड़ा विरोध जताते हुए छत्तीसगढ़ के पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने स्कूल प्रबंधन की जमकर आलोचना की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि सरगुजा जिले में ही कोई स्कूल सरगुजिहा बोलने के कारण बच्चे का एडमिशन रोकता है, तो ऐसे संस्थान को चलने का कोई हक नहीं है। सिंहदेव ने मांग की कि शिक्षा विभाग को इस मामले की तत्काल जांच करनी चाहिए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो स्कूल को बंद कर देना चाहिए। उन्होंने इसे स्थानीय संस्कृति और भाषा का घोर अपमान बताया।
NSUI का विरोध और पंजीयन रद्द करने की मांग
छात्र संगठन NSUI ने इस मुद्दे को लेकर सरगुजा कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा है। संगठन का तर्क है कि जहाँ एक ओर सरकारी नौकरियों में स्थानीय बोली के ज्ञान को अनिवार्य किया जा रहा है, वहीं निजी शिक्षण संस्थान इसे पिछड़ापन मानकर बच्चों के साथ भेदभाव कर रहे हैं। NSUI ने मांग की है कि संबंधित स्कूल का पंजीयन तुरंत रद्द किया जाए ताकि भविष्य में कोई भी संस्थान इस तरह की भाषाई ऊंच-नीच न कर सके।
प्रशासनिक जांच और कलेक्टर के निर्देश
मामले की गंभीरता को देखते हुए सरगुजा कलेक्टर अजीत वसंत ने जांच के आदेश जारी कर दिए हैं। उन्होंने जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) को निर्देशित किया है कि इस शिकायत की बारीकी से जांच की जाए। कलेक्टर ने आश्वस्त किया है कि यदि स्कूल प्रबंधन दोषी पाया जाता है, तो उनके खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल स्कूल प्रबंधन की ओर से इस पूरे विवाद पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन स्थानीय स्तर पर आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
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