क्या है यह विधेयक?
यह विधेयक प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री या राज्य के किसी मंत्री को गंभीर अपराधों में 30 दिनों से अधिक जेल में रहने की स्थिति में पद से हटा देगा। इसका उद्देश्य ऐसे ‘दागी’ नेताओं को संवैधानिक संरक्षण से बाहर निकालना है ताकि वे अपने पदों पर बने न रहें। यह एक बड़ा कदम माना जा रहा है जो राजनीतिक पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देगा।

संसद में स्थिति क्या है?
संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। लोकसभा में कुल 542 सदस्य हैं, और इस विधेयक के पारित होने के लिए कम से कम 361 सांसदों का समर्थन जरूरी है। वर्तमान में, केंद्र की सत्ताधारी एनडीए के पास कुल 293 सांसद हैं। यदि एनडीए के अलावा कोई अन्य दल भी इस विधेयक का समर्थन करता है, तब भी भाजपा अकेले 361 का आंकड़ा पार नहीं कर पाएगी।

राज्यसभा की बात करें तो रिक्तियों को छोड़कर 239 सदस्य हैं, और यहाँ 160 वोट चाहिए। एनडीए के पास फिलहाल 132 सदस्य हैं। हालांकि कुछ क्षेत्रीय दलों जैसे बीजेडी, बीआरएस और वाईएसआर कांग्रेस का समर्थन मिलने पर यह संख्या बढ़ सकती है, लेकिन फिर भी जरूरी बहुमत हासिल करना चुनौतीपूर्ण होगा।
आगे क्या होगा?
केंद्र ने फिलहाल इस विधेयक पर मतदान कराने की बजाय इसे संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया है ताकि विधेयक पर व्यापक चर्चा हो सके। यह राजनीतिक समझौते के लिए एक संकेत माना जा रहा है।
राज्यों का पक्ष भी मायने रखेगा
संविधान संशोधन के लिए केवल संसद से बहुमत लेना ही काफी नहीं है। इसे देश के आधे से अधिक राज्यों की विधानसभाओं में भी मंजूरी लेना जरूरी है। हालांकि भाजपा का कई राज्यों में प्रभाव है, लेकिन सभी राज्यों का समर्थन जुटाना उतना आसान नहीं होगा। विशेषकर उन राज्यों में जहां भाजपा की सत्ता नहीं है, वहाँ यह विधेयक विरोध का सामना कर सकता है।
क्या पारित होगा विधेयक?
आंकड़ों और राजनीतिक समीकरणों के हिसाब से केंद्र सरकार को यह विधेयक पारित कराने में कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। जब तक बड़ा गठबंधन या कई विपक्षी दल इसका समर्थन नहीं करते, तब तक विधेयक का पारित होना मुश्किल है। साथ ही राज्यों में भी व्यापक समर्थन आवश्यक है। इसलिए, फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि यह विधेयक संसद के दोनों सदनों और राज्यों की विधानसभाओं से पारित हो पाएगा या नहीं।










