Thailand Cambodia Ceasefire
Thailand Cambodia Ceasefire: थाईलैंड और कंबोडिया के बीच पिछले कई हफ्तों से चल रहा खूनी संघर्ष फिलहाल थम गया है। शनिवार को दोनों देशों ने एक नए युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसका मुख्य उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में क्षेत्रीय दावों को लेकर उपजे विवाद को सुलझाना है। यह समझौता स्थानीय समयानुसार दोपहर 12 बजे से प्रभावी हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस बार शर्तों का कड़ाई से पालन हुआ, तो दक्षिण-पूर्व एशिया के इन दो पड़ोसियों के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव कम हो सकता है।
इस ताजा समझौते की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें केवल गोलीबारी रोकने का ही वादा नहीं किया गया है, बल्कि भविष्य की सैन्य गतिविधियों को लेकर भी सख्त नियम बनाए गए हैं। समझौते के तहत दोनों देश इस बात पर सहमत हुए हैं कि वे विवादित क्षेत्रों में अपनी सेनाओं की आवाजाही नहीं बढ़ाएंगे। साथ ही, एक-दूसरे के हवाई क्षेत्र (Airspace) का सैन्य उद्देश्यों के लिए उल्लंघन न करने पर भी विशेष सहमति बनी है। गौरतलब है कि पिछले 6 महीनों के भीतर यह चौथा मौका है जब दोनों देशों ने शांति का रास्ता चुनने की कोशिश की है।
सीमा पर भड़की यह ताजा हिंसा लगभग 20 दिनों तक जारी रही, जिसने दोनों देशों के नागरिकों के बीच दहशत का माहौल पैदा कर दिया था। कंबोडिया के रक्षा मंत्रालय ने आरोप लगाया कि शनिवार सुबह समझौते से ठीक पहले भी कुछ स्थानों पर हमले किए गए थे। रिकॉर्ड के अनुसार, हालिया संघर्ष के दौरान केवल थाईलैंड की ओर से हवाई हमलों की खबरें सामने आई थीं। इस बार के युद्धविराम को लेकर दोनों पक्ष गंभीर दिख रहे हैं, क्योंकि लगातार होती मौतों और आर्थिक नुकसान ने दोनों देशों की विकास दर पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाला है।
इस नए शांति समझौते में एक बहुत ही संवेदनशील शर्त शामिल की गई है। थाईलैंड इस बात पर सहमत हुआ है कि यदि अगले 72 घंटों तक युद्धविराम का पूरी तरह से पालन होता है, तो वह कंबोडिया के उन 18 सैनिकों को रिहा कर देगा जिन्हें जुलाई में हुए पहले संघर्ष के दौरान पकड़ा गया था। इन सैनिकों की सुरक्षित वापसी कंबोडिया की एक प्रमुख मांग रही है। इसके अतिरिक्त, दोनों देशों ने जुलाई में हुए पुराने समझौतों के प्रति भी अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है, जिससे यह उम्मीद जागी है कि पुराने विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाया जा सकेगा।
इस विवाद की जड़ें पुरानी हैं, लेकिन जुलाई में हुए मूल युद्धविराम में अंतरराष्ट्रीय शक्तियों की बड़ी भूमिका थी। उस समय मलेशिया की मध्यस्थता और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारी दबाव के कारण दोनों पक्ष मेज पर आए थे। ट्रंप ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यदि युद्ध नहीं रुका, तो दोनों देशों को दी जाने वाली व्यापारिक सुविधाएं रोक दी जाएंगी। अक्टूबर में मलेशिया में हुए क्षेत्रीय सम्मेलन के दौरान इस समझौते को और भी औपचारिक रूप दिया गया था, जिसमें खुद ट्रंप ने शिरकत की थी।
दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और समझौतों के बावजूद, दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार नहीं देखा गया। पिछले कुछ महीनों में दोनों पक्षों की ओर से तीखा प्रचार युद्ध (Propaganda War) जारी रहा, जिससे सीमा पर छोटी-मोटी हिंसा होती रही। यही हिंसा दिसंबर की शुरुआत में एक बड़े युद्ध में तब्दील हो गई थी। आलोचकों का कहना है कि दोनों देश बार-बार बच्चों की तरह लड़ते हैं और फिर समझौते कर लेते हैं, जो कुछ ही दिनों में टूट जाते हैं। अब देखना यह होगा कि क्या यह नया समझौता वास्तव में स्थायी शांति ला पाएगा या इतिहास खुद को दोहराएगा।
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