Stock Market Decline: सितंबर महीने में भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव का दौर जारी रहा। महीने के पहले हाफ में जीएसटी रिफॉर्म और ट्रेड डील की उम्मीदों से बाजार ने जबरदस्त तेजी देखी, लेकिन अमेरिकी एच1बी वीजा फीस वृद्धि और डॉलर की मजबूती ने निवेशकों का भरोसा हिला दिया। IT शेयरों में दबाव और कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने भी बाजार की चाल को प्रभावित किया है। आइए आंकड़ों के साथ समझते हैं सितंबर महीने में शेयर बाजार की क्या कहानी रही।
सितंबर के पहले 15 दिनों में शेयर बाजार में जबरदस्त तेजी देखने को मिली। 2 सितंबर को सेंसेक्स 80,157.88 पर बंद हुआ था, जो 18 सितंबर तक बढ़कर 83,013.96 अंक तक पहुंच गया, यानी 3.56 फीसदी की तेजी। निफ्टी भी इसी दौरान 24,579.60 से 25,423.60 अंक तक पहुंचा, जिसमें 3.43 फीसदी का इजाफा हुआ। इस तेजी में GST काउंसिल की मीटिंग और टैक्स स्लैब में कटौती की उम्मीद के साथ-साथ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के भारत और मोदी से बेहतर संबंधों की बात ने भी निवेशकों का मनोबल बढ़ाया।
18 सितंबर तक बाजार की तेजी बनी रही, लेकिन 21 सितंबर को ट्रंप ने एच1बी वीजा फीस को बढ़ाकर 1 लाख डॉलर से ज्यादा कर दिया। इस फैसले का भारतीय IT कंपनियों पर सीधा असर पड़ा क्योंकि अमेरिका में काम कर रहे कई भारतीय कर्मचारी और कंपनियां इस वीजा पर निर्भर हैं। इस कदम से कंपनियों के कॉस्ट बढ़ जाएंगे, जिससे शेयर बाजार में गिरावट आई। 24 सितंबर तक सेंसेक्स 1,298 अंक यानी 1.56% गिरकर 81,715.63 पर और निफ्टी 1.44% गिरकर 25,056.90 पर आ गया।
सितंबर में विदेशी निवेशकों ने 11,582 करोड़ रुपये का निकासी किया, जबकि पूरे साल में ये आंकड़ा 1.42 लाख करोड़ के करीब पहुंच चुका है।
डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर होकर 88.75 के लेवल पर बंद हुआ, जिससे आयात महंगा और बाजार दबाव में रहा।
डॉलर इंडेक्स में 0.5% की बढ़ोतरी ने भी भारतीय शेयर बाजार पर दबाव डाला।
मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड 70 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया, जिससे भारत की आर्थिक लागत बढ़ी।
टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो, टेक महिंद्रा जैसे आईटी दिग्गजों के शेयरों में गिरावट आई क्योंकि वीजा फीस बढ़ोतरी से उनकी भविष्य की कमाई पर सवाल उठे।
18 से 24 सितंबर के बीच बीएसई के मार्केट कैप में 5.16 लाख करोड़ रुपये से अधिक की गिरावट आई, जबकि जीएसटी रिफॉर्म के बाद बाजार ने लगभग 12 लाख करोड़ रुपये का फायदा देखा था। इस तेजी का आधा हिस्सा अब तक खत्म हो चुका है।
अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड डील के मसले अब अनिश्चितता के घेरे में हैं। वीजा फीस बढ़ोतरी और टैरिफ को लेकर दोनों देशों के बीच वार्ताएं तनावपूर्ण चल रही हैं। विदेशी निवेशकों के पलायन और रुपया के कमजोर होने से भी बाजार में दबाव बना रहेगा। हालांकि, बाजार के लिए सकारात्मक संकेत तभी मिलेंगे जब दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते बेहतर होंगे और वैश्विक आर्थिक स्थिरता लौटेगी।
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