Tiger in Gujarat
Tiger in Gujarat: गुजरात के वन्यजीव इतिहास में फरवरी का महीना एक ऐतिहासिक पल लेकर आया, जब रतनमहल वाइल्डलाइफ सेंचुरी में एक रॉयल बंगाल टाइगर की दहाड़ सुनाई दी। जहाँ एक ओर बाघ की वापसी से राज्य के वन विभाग में खुशी की लहर है, वहीं दूसरी ओर एक चिंता ने अधिकारियों की रातों की नींद उड़ा रखी है। पिछले 9 महीनों से यह बाघ गुजरात के जंगलों में विचरण कर रहा है, लेकिन इसकी अकेलेपन की स्थिति ने विभाग को एक बड़ी चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है।
लगभग पांच साल का यह नर बाघ पिछले 9 महीनों से रतनमहल के जंगलों में अकेला है। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि बाघ स्वभाव से प्रादेशिक जानवर होते हैं और साथी न मिलने की स्थिति में वे नए क्षेत्र की तलाश में मीलों दूर चले जाते हैं। वन विभाग को डर है कि यदि इस बाघ को जल्द ही जोड़ीदार नहीं मिला, तो यह गुजरात की सीमा छोड़कर वापस जा सकता है। इसी खतरे को देखते हुए गुजरात वन विभाग ने केंद्र सरकार को एक औपचारिक पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि यहाँ एक बाघिन (Tigress) भेजी जाए, ताकि बाघ का स्थायी निवास सुनिश्चित हो सके और भविष्य में प्रजनन के जरिए इनकी संख्या बढ़ सके।
दाहोद जिला, जहाँ रतनमहल सेंचुरी स्थित है, भौगोलिक रूप से मध्य प्रदेश के झाबुआ-काठीवाड़ा क्षेत्र के बेहद करीब है। अधिकारियों ने अपने पत्र में तर्क दिया है कि दोनों राज्यों का वातावरण और वन क्षेत्र लगभग एक समान है। मध्य प्रदेश में वर्तमान में लगभग 785 बाघ मौजूद हैं। बाघों की बढ़ती संख्या के कारण वहां के युवा बाघ अक्सर नए इलाकों और सुरक्षा की तलाश में भटकते हुए गुजरात की ओर रुख कर सकते हैं। यदि यहाँ एक अनुकूल इकोसिस्टम और मादा साथी उपलब्ध हो, तो गुजरात प्राकृतिक रूप से बाघों का नया ठिकाना बन सकता है।
गुजरात में बाघों का इतिहास काफी पुराना रहा है, लेकिन वर्ष 2001 के बाद राज्य से यह प्रजाति पूरी तरह गायब हो गई थी। लगभग 23 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद रतनमहल में इस बाघ की सक्रियता ने नई उम्मीदें जगाई हैं। पिछले 9 महीनों से वन विभाग की विशेष टीमें कैमरा ट्रैप और फील्ड मॉनिटरिंग के जरिए इस बाघ की हर गतिविधि पर पैनी नजर रख रही हैं। प्राप्त तस्वीरों और फुटप्रिंट्स (पगमार्क) से यह साफ है कि बाघ ने इस सेंचुरी को अपना घर मान लिया है।
वन अधिकारियों के अनुसार, यह नर बाघ पूरी तरह स्वस्थ है और सबसे अच्छी बात यह है कि इसने अभी तक स्थानीय इंसानों या पालतू मवेशियों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया है। वह जंगल के भीतर ही रहना पसंद कर रहा है। उसकी भोजन संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए विभाग ने जंगल में शिकार की कुछ विशेष प्रजातियों (जैसे चीतल और सांभर) को भी छोड़ा है, ताकि बाघ को भोजन के लिए भटकना न पड़े और वह सुरक्षित महसूस करे।
इस बाघ की स्थायी मौजूदगी के साथ ही गुजरात भारत के उन अत्यंत दुर्लभ और चुनिंदा राज्यों की श्रेणी में शामिल हो गया है, जहाँ प्रकृति के ‘बिग थ्री’ यानी शेर, तेंदुआ और बाघ तीनों एक साथ पाए जाते हैं। गिर के एशियाई शेरों के लिए मशहूर गुजरात अब बाघों के संरक्षण के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाने की ओर अग्रसर है। यदि केंद्र सरकार की ओर से बाघिन लाने की अनुमति मिल जाती है, तो आने वाले वर्षों में रतनमहल सेंचुरी बाघों के संरक्षण का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरेगा।
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