Middle East Crisis
Middle East Crisis : मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में शांति की कोशिशों को एक बड़ा झटका लगा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान द्वारा पेश किए गए नए युद्धविराम (सीजफायर) प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है। ट्रंप ने इस प्रस्ताव को ‘बेवकूफी भरा’ करार देते हुए स्पष्ट किया कि इस तरह की चालबाजी से अमेरिका पर कोई दबाव नहीं बनाया जा सकता। व्हाइट हाउस से जारी बयान में ट्रंप ने न केवल समझौते से इनकार किया, बल्कि ईरान पर अमेरिका की ‘पूर्ण विजय’ की भविष्यवाणी भी कर दी। ट्रंप के इस आक्रामक तेवर ने साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में तेहरान और वाशिंगटन के बीच सैन्य और कूटनीतिक टकराव और भी भीषण रूप ले सकता है।
इन तनावपूर्ण परिस्थितियों के बीच एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है, जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में खलबली मचा दी है। सीबीएस न्यूज ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से दावा किया है कि पाकिस्तान, जो खुद को अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ बता रहा है, गुप्त रूप से ईरान की मदद कर रहा था। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिकी हवाई हमलों से बचाने के लिए ईरान के सैन्य और टोही विमानों को अपने एयर फील्ड्स पर पार्क करने की अनुमति दी थी। यह खबर ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंच पर निष्पक्ष होने का ढोंग कर रहा है। यदि यह दावा पूरी तरह सच साबित होता है, तो यह पाकिस्तान के लिए आत्मघाती कदम हो सकता है, क्योंकि इससे अमेरिका के साथ उसके संबंध पूरी तरह टूट सकते हैं।
रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि अप्रैल में जब ट्रंप प्रशासन ने सैन्य कार्रवाई के संकेत दिए थे, तब ईरान ने आनन-फानन में अपने महत्वपूर्ण टोही और खुफिया विमान पाकिस्तान के ‘नूर खान एयरबेस’ भेजे थे। इतना ही नहीं, सुरक्षा के लिहाज से ईरान ने अपने कुछ नागरिक विमानों को पड़ोसी देश अफगानिस्तान में भी छिपाया था। दूसरी ओर, पाकिस्तान इस दावे को सिरे से नकार रहा है। एक वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारी ने सफाई देते हुए कहा कि नूर खान एयरबेस शहर के मध्य में स्थित है और वहां इतने बड़े बेड़े को दुनिया की नजरों से छिपाकर रखना असंभव है। हालांकि, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के पास मौजूद इनपुट कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।
पाकिस्तान की इस कथित ‘कारिस्तानी’ ने डोनाल्ड ट्रंप के करीबियों को आगबबूला कर दिया है। ट्रंप के भरोसेमंद सलाहकार और अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर चेतावनी देते हुए कहा कि अगर पाकिस्तान ने वास्तव में ईरानी विमानों को पनाह दी है, तो उसे मध्यस्थ की भूमिका से तुरंत हटा देना चाहिए। ग्राहम ने यह भी संकेत दिया कि इजरायल के प्रति पाकिस्तान के पुराने रुख को देखते हुए उन्हें इस धोखेबाजी पर ज्यादा आश्चर्य नहीं हो रहा है। उन्होंने पाकिस्तान के साथ अमेरिकी संबंधों के ‘पुनर्मूल्यांकन’ की जरूरत पर जोर दिया है।
वर्तमान स्थिति यह है कि पाकिस्तान एक तरफ अमेरिका से आर्थिक और सैन्य सहयोग की उम्मीद करता है, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ अपनी धार्मिक और क्षेत्रीय नजदीकी निभाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन विमानों को पनाह देने के इस खुलासे ने इस्लामाबाद को कठघरे में खड़ा कर दिया है। दुनिया के रक्षा विशेषज्ञ मान रहे हैं कि पाकिस्तान की यह ‘डबल गेम’ उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग कर सकती है। ट्रंप की ‘ईरान पर विजय’ की भविष्यवाणी और पाकिस्तान की संदिग्ध भूमिका ने मिडिल ईस्ट के बारूद के ढेर में चिंगारी सुलगा दी है, जो किसी भी वक्त बड़े वैश्विक संकट का रूप ले सकती है।
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