UN Report : जब बच्चे सुबह स्कूल के लिए निकलते हैं, तो उनकी जरूरतें सिर्फ पढ़ाई और किताबों तक सीमित नहीं होतीं। सुरक्षित वातावरण, स्वच्छ पेयजल, शौचालय और हाथ धोने की सुविधा भी उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य का अहम हिस्सा हैं। WHO और UNICEF के Joint Monitoring Programme (JMP) की नई रिपोर्ट “Progress on Drinking Water, Sanitation and Hygiene in Schools 2015-2025” ने दुनियाभर के स्कूलों में इन बुनियादी सुविधाओं की स्थिति का आकलन किया है। रिपोर्ट में भारत से जुड़ा एक महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने आया है।
वैश्विक स्तर पर सैनिटेशन सुविधा से करोड़ों बच्चे वंचित
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 तक दुनियाभर में करीब 24.4 करोड़ बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ रहे थे, जहां बुनियादी सैनिटेशन सुविधा या अलग शौचालय उपलब्ध नहीं था। इनमें लगभग 5 करोड़ बच्चे भारत में हैं। यानी वैश्विक स्तर पर इस सुविधा से वंचित बच्चों की बड़ी संख्या भारत में है। भारत के बाद नाइजीरिया में करीब 3.4 करोड़, इथियोपिया में 2.6 करोड़, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में 1.1 करोड़ और इंडोनेशिया में लगभग 80 लाख बच्चे इस सुविधा से दूर हैं।
शौचालय की कमी का असर बालिकाओं की शिक्षा पर
स्कूलों में पर्याप्त और स्वच्छ शौचालय नहीं होने का असर खासतौर पर किशोरियों की शिक्षा पर पड़ सकता है। किशोरावस्था के दौरान स्वच्छता और निजता से जुड़ी सुविधाओं की जरूरत बढ़ जाती है। यदि स्कूल में सुरक्षित और उपयोग योग्य शौचालय उपलब्ध नहीं हो, तो छात्राओं के लिए नियमित रूप से स्कूल जाना मुश्किल हो सकता है। इसलिए सैनिटेशन व्यवस्था को केवल बुनियादी सुविधा नहीं, बल्कि बच्चों की गरिमा, स्वास्थ्य और शिक्षा से जोड़कर देखा जाता है।
भारत में सैनिटेशन सुविधा को लेकर सुधार के संकेत
रिपोर्ट में भारत के लिए कुछ सकारात्मक आंकड़े भी सामने आए हैं। 2015 से 2025 के बीच भारत में ऐसे स्कूलों की संख्या में करीब 14 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जहां बुनियादी सैनिटेशन सुविधा उपलब्ध नहीं थी। इसका संकेत है कि पिछले एक दशक में स्कूलों में शौचालयों की पहुंच बढ़ी है। हालांकि बड़ी आबादी और स्कूलों की विशाल संख्या को देखते हुए अभी भी कई स्तरों पर सुधार की आवश्यकता बनी हुई है।
साफ पेयजल के मामले में भारत की प्रगति
स्कूलों में पीने के साफ पानी की उपलब्धता के मामले में भारत की प्रगति रिपोर्ट में अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई देती है। भारत उन 28 देशों में शामिल है, जो 2030 तक सभी स्कूलों में बुनियादी पेयजल सुविधा उपलब्ध कराने के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्कूलों में पेयजल की पहुंच में हर वर्ष 4 प्रतिशत से अधिक सुधार हुआ है।
2025 में 1.2 करोड़ बच्चे पेयजल सुविधा से दूर
आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत में लगभग 1.2 करोड़ बच्चे ऐसे थे, जिनके स्कूलों में उचित बुनियादी पेयजल सुविधा उपलब्ध नहीं थी। यह वैश्विक स्तर पर ऐसी सुविधा से वंचित बच्चों की संख्या का करीब 5 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में हुई प्रगति के बावजूद सभी स्कूलों तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाना अभी भी महत्वपूर्ण चुनौती है।
हाइजीन सुविधा में भारत के सामने बड़ी चुनौती
हाथ धोने के लिए पानी और साबुन जैसी बुनियादी हाइजीन सुविधाओं को लेकर स्थिति अभी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 2 करोड़ बच्चे ऐसे हैं, जिनके स्कूलों में बुनियादी हाथ धोने की सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा पर्याप्त और अपडेटेड डेटा की कमी के कारण 2024 के बाद भारत तथा मध्य-दक्षिण एशिया क्षेत्र में हाइजीन कवरेज का सटीक आकलन भी चुनौतीपूर्ण रहा।
2030 के SDG लक्ष्य को लेकर वैश्विक चिंता
संयुक्त राष्ट्र के Sustainable Development Goals में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सुरक्षित पानी तथा स्वच्छता को महत्वपूर्ण लक्ष्य माना गया है। JMP रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए मौजूदा वैश्विक प्रगति की गति काफी बढ़ानी होगी। बुनियादी पेयजल के लिए प्रगति लगभग चार गुना, सैनिटेशन के लिए पांच गुना और हाइजीन के लिए चार गुना तेज करनी होगी।
स्कूलों में स्वच्छता सुविधाएं शिक्षा की बुनियाद
रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता केवल कक्षाओं, शिक्षकों और किताबों से तय नहीं होती। सुरक्षित पानी, स्वच्छ शौचालय और हाथ धोने की सुविधा बच्चों के स्वास्थ्य और नियमित उपस्थिति के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। भारत ने पेयजल सुविधा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है, लेकिन सैनिटेशन और हाइजीन के मोर्चे पर इसी तरह निरंतर प्रयास की जरूरत बनी हुई है।
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