US Supreme Court
US Supreme Court: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए विवादास्पद ‘ग्लोबल टैरिफ’ पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर अपना बहुप्रतीक्षित फैसला फिलहाल टाल दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब इस मामले की अगली सुनवाई कल निर्धारित की गई है। इससे पहले उम्मीद की जा रही थी कि 9 जनवरी को अदालत अपना रुख स्पष्ट कर देगी, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया और मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसे आगे बढ़ा दिया गया है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने इस अदालती कार्यवाही पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि यदि सुप्रीम कोर्ट उनके द्वारा लगाए गए शुल्कों को रद्द करने का निर्णय लेता है, तो अमेरिका के लिए स्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाएंगी। ट्रंप के अनुसार, इस फैसले का मतलब होगा कि अमेरिका को अब तक टैरिफ के जरिए एकत्र किए गए अरबों डॉलर कंपनियों को वापस करने होंगे। उन्होंने इसे आर्थिक स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा बताया है और उम्मीद जताई है कि अदालत राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखेगी।
यदि सुप्रीम कोर्ट ट्रंप के टैरिफ लगाने के अधिकार को अवैध घोषित करता है, तो इसके वैश्विक बाजार पर दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे:
निर्यातकों को राहत: भारत, चीन और यूरोपीय देशों के निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में अपना सामान बेचने में बड़ी राहत मिलेगी।
कीमतों में गिरावट: अंतरराष्ट्रीय सामान पर टैक्स कम होने से कई उपभोक्ता वस्तुएं सस्ती हो जाएंगी।
बाजार में तेजी: वैश्विक अनिश्चितता खत्म होने से शेयर बाजारों में भारी उछाल आने की संभावना है।
धन की वापसी: अमेरिकी सरकार को कंपनियों से वसूला गया राजस्व वापस करना पड़ सकता है, जिससे सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ेगा।
इसके विपरीत, यदि अदालत राष्ट्रपति की शक्तियों को बरकरार रखती है, तो ट्रंप का ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडा और मजबूत होगा। ऐसी स्थिति में:
टैरिफ जारी रहेंगे: अन्य देशों से आने वाले सामान पर भारी आयात शुल्क लागू रहेगा।
व्यापार युद्ध का खतरा: जवाब में अन्य देश भी अमेरिकी सामान पर टैक्स बढ़ा सकते हैं, जिससे वैश्विक ‘ट्रेड वॉर’ की स्थिति पैदा हो सकती है।
महंगाई की मार: आयात शुल्क के कारण अमेरिका में विदेशी सामान महंगे बने रहेंगे, जिसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा।
ट्रंप ने अप्रैल 2025 में आयात शुल्क बढ़ाने के अपने फैसले को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से जोड़ा था। उनका तर्क है कि इन टैरिफ्स से अमेरिका को अब तक 600 अरब डॉलर से अधिक का राजस्व प्राप्त हुआ है। ट्रंप का दावा है कि यह भारी धनराशि विदेशी निर्भरता को कम करने और घरेलू उद्योगों को मजबूत करने के लिए आवश्यक है। उन्होंने दलील दी है कि आर्थिक सुरक्षा ही वास्तविक राष्ट्रीय सुरक्षा है, इसलिए राष्ट्रपति के पास ऐसे फैसले लेने का पूर्ण अधिकार होना चाहिए।
इस पूरे कानूनी विवाद की जड़ में 49 साल पुराना ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ (IEEPA) है। 1977 में बने इस कानून का उद्देश्य राष्ट्रपति को युद्ध या असाधारण संकट की स्थिति में त्वरित आर्थिक फैसले लेने की शक्ति देना था। अब सर्वोच्च अदालत को यह तय करना है कि क्या वैश्विक व्यापार पर भारी टैक्स लगाना इस कानून के दायरे में आता है या ट्रंप ने अपनी शक्तियों का अतिक्रमण किया है।
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