Hindu Funeral Rituals : संसार में जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु निश्चित है, यह जीवन का सबसे बड़ा सत्य है। हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के दौरान कई ऐसी परंपराएं निभाई जाती हैं, जिन्हें अक्सर लोग केवल अंधविश्वास या पुरानी मान्यताओं से जोड़कर देखते हैं। इनमें से एक मुख्य परंपरा है मृतक के नाक, कान और मुंह में रुई लगाना। हालांकि, देखने में यह एक सामान्य प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन इसके पीछे गहरे वैज्ञानिक, चिकित्सीय और व्यावहारिक कारण छिपे हैं। ये कारण न केवल स्वच्छता बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं, बल्कि शरीर की गरिमा को सुरक्षित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शरीर में होने वाले जैविक परिवर्तन और गैसों का उत्सर्जन
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो, मृत्यु के बाद मानव शरीर में कई जैविक और रासायनिक परिवर्तन अत्यंत तेजी से होने लगते हैं। जैसे ही हृदय की धड़कन रुकती है और सांसें थम जाती हैं, शरीर के भीतर का पाचन तंत्र काम करना बंद कर देता है। इस प्रक्रिया के दौरान शरीर के अंदर मौजूद पदार्थों से मीथेन और हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी गैसें उत्पन्न होने लगती हैं। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के फोरेंसिक विज्ञान विभाग के रिसर्चर भावेश माली के अनुसार, मृत्यु के बाद शरीर की मांसपेशियां शिथिल पड़ जाती हैं, जिससे शरीर के भीतर विभिन्न प्रकार के तरल पदार्थों का निर्माण होता है। ये दुर्गंधयुक्त तरल पदार्थ नाक, कान या मुंह के माध्यम से बाहर निकल सकते हैं, जो बैक्टीरिया के प्रसार और शरीर में सूजन पैदा करने का कारण बनते हैं।

नाक, कान और मुंह में रुई लगाने के व्यावहारिक लाभ
मृतक के शरीर के इन खुले अंगों में रुई लगाने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं। सबसे पहले, यह रुई शरीर से निकलने वाली दुर्गंधयुक्त गैसों और तरल पदार्थों के रिसाव को रोकने का एक प्रभावी माध्यम है। यदि ये तरल पदार्थ बाहर निकलते हैं, तो वे न केवल आसपास के वातावरण को दूषित करते हैं, बल्कि मक्खियों और अन्य कीटों को भी आकर्षित करते हैं, जिससे संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, रुई लगाने से नाक और कान के रास्ते बाहरी हवा अंदर नहीं जा पाती, जिससे शरीर के जल्दी फूलने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। यह विधि न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में अंतिम संस्कार की तैयारियों के दौरान स्वच्छता बनाए रखने के लिए अपनाई जाती है।
गरुड़ पुराण और धार्मिक मान्यताओं का महत्व
वैज्ञानिक तर्कों के अतिरिक्त, भारतीय संस्कृति और गरुड़ पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों में भी इसका विशेष महत्व बताया गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के पश्चात शरीर के सभी खुले द्वारों को बंद करना आवश्यक होता है। प्राचीन समय में इन अंगों पर सोने के कण रखे जाते थे, जो शुद्धता का प्रतीक माने जाते थे। समय के साथ, अब इनकी जगह कपास (रुई) या तुलसी के पत्तों का प्रयोग होने लगा है। तुलसी के पत्तों के संदर्भ में यह माना जाता है कि इसमें वातावरण को शुद्ध करने और सूक्ष्म गैसों को नियंत्रित करने की अद्भुत शक्ति होती है। अतः, यह परंपरा न केवल व्यावहारिक स्वच्छता के लिए अनिवार्य है, बल्कि इसे आध्यात्मिक और धार्मिक रूप से भी अत्यंत पवित्र और आवश्यक माना गया है।
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