Zohran Mamdani Statement: उमर खालिद की तुलना नेल्सन मंडेला से, बयान पर छिड़ी बहस

Zohran Mamdani Statement: न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहराब ममदानी ने 15 जुलाई को न्यूयॉर्क टाउन हॉल में आयोजित ‘नेल्सन मंडेला ग्लोबल लीडरशिप फोरम’ के दौरान एक ऐसा बयान दिया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है। इस फोरम में मंडेला फाउंडेशन द्वारा आयोजित उद्घाटन भाषण देते हुए, ममदानी ने दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद विरोधी आंदोलन के नायक नेल्सन मंडेला को याद किया। हालांकि, उनके भाषण का एक बड़ा हिस्सा भारत में जेल में बंद पूर्व जेएनयू छात्र और सोशल एक्टिविस्ट उमर खालिद पर केंद्रित रहा। ममदानी ने बिना किसी झिझक के खालिद की तुलना सीधे मंडेला से कर दी, जिससे राजनीतिक गलियारों में एक नई चर्चा शुरू हो गई है।

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उमर खालिद की जेल यात्रा और कानूनी संघर्ष

उमर खालिद को दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों और देशद्रोह के आरोपों में लगभग छह साल से जेल में रखा गया है। उनकी जमानत याचिकाएं अदालतों द्वारा लगातार खारिज की जा रही हैं, और उनके खिलाफ चल रहा ट्रायल भी काफी लंबा खिंचता जा रहा है। इसी संदर्भ में बोलते हुए ममदानी ने कहा कि खालिद को ‘ऑर्गेनाइज्ड टेररिज्म’ (संगठित आतंकवाद) के मनगढ़ंत आरोपों में एक राजनीतिक कैदी के रूप में कैद किया गया है। उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा कि मदीबा (मंडेला) जिस तरह से आम लोगों के संघर्ष के प्रतीक बने, वैसा ही कुछ भारत में खालिद के साथ हो रहा है और हमें ऐसे व्यक्तियों का समर्थन करना चाहिए।

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ममदानी का भारत से खास जुड़ाव और वैश्विक दृष्टिकोण

ज़ोहराब ममदानी और भारत के बीच गहरा संबंध है। उनकी मां, मीरा नायर, एक प्रसिद्ध भारतीय फिल्म निर्देशक हैं, जिसके चलते भारत के राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों में उनकी गहरी दिलचस्पी रही है। यही कारण है कि वे पहले भी उमर खालिद के पक्ष में पत्र लिख चुके हैं। हालांकि, अपने भाषण में उन्होंने न केवल खालिद का मुद्दा उठाया, बल्कि फिलिस्तीन के वर्तमान हालातों पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों की वकालत करते हुए कहा कि हम तब तक मूकदर्शक नहीं रह सकते जब तक फिलिस्तीन में मासूमों की जानें जा रही हैं। उन्होंने युद्ध रोकने और फिलिस्तीन को भविष्य सुरक्षित करने के लिए वैश्विक एकजुटता की अपील की।

तुलना पर उठे सवाल और विवादित दृष्टिकोण

ममदानी की यह टिप्पणी भारत में एक बड़े विवाद का विषय बन गई है। नेल्सन मंडेला जैसे विश्व-स्वीकृत शांति दूत और नायक की तुलना दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद से करना कई लोगों को अनुचित लग रहा है। आलोचकों का तर्क है कि मंडेला ने जिस तरह का व्यापक सामाजिक और नैतिक कद हासिल किया था, उसकी तुलना किसी विवादास्पद कानूनी मामले से करना ऐतिहासिक संदर्भों को नजरअंदाज करना है। ममदानी का यह बयान निश्चित रूप से भारत की न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने के तौर पर देखा जा रहा है, जिसने वैश्विक मंच पर एक बार फिर भारत के घरेलू मुद्दों को चर्चा में ला खड़ा किया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय राजनीतिक विशेषज्ञ और सत्ता पक्ष इस अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप को किस प्रकार देखते हैं।

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Chandan Das

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