Tamil Nadu Education Policy: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने शुक्रवार को राज्य की नई शिक्षा नीति की औपचारिक घोषणा की, जिसमें ‘द्विभाषी मॉडल’ को अपनाने का निर्णय लिया गया है। इस नीति के तहत अब तमिलनाडु के स्कूलों में केवल तमिल और अंग्रेज़ी पढ़ाई जाएगी। राज्य सरकार के इस फैसले को केंद्र की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) और हिंदी के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ एक स्पष्ट राजनीतिक और सांस्कृतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

त्रिभाषा बनाम द्विभाषा नीति
जहाँ केंद्र की NEP तीन भाषाओं – हिंदी, अंग्रेज़ी और एक क्षेत्रीय भाषा – के पढ़ाई मॉडल पर ज़ोर देती है, वहीं तमिलनाडु ने इसका विरोध करते हुए ‘त्रिभाषा नीति’ को खारिज कर दिया है। मुख्यमंत्री स्टालिन का कहना है कि हिंदी को शिक्षा के ज़रिए थोपना देश के गैर-हिंदी भाषी राज्यों के साथ भाषाई अन्याय है।

स्टालिन ने कहा, “हमारा विरोध किसी भाषा से नहीं, बल्कि भाषा के प्रभुत्व से है। हिंदी को एक राष्ट्रीय भाषा की तरह थोपा जाना देश की विविध भाषाई पहचान पर हमला है। तमिलनाडु हमेशा से भाषाई विविधता का सम्मान करता आया है और करता रहेगा।”
नई नीति का आधार
तमिलनाडु में इस द्विभाषी शिक्षा नीति की प्रक्रिया 2022 में शुरू हुई थी, जब सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति मुरुगेसन की अध्यक्षता में 14 सदस्यीय समिति गठित की गई। समिति ने अपनी रिपोर्ट पिछले साल जुलाई में मुख्यमंत्री को सौंपी थी, जिसके आधार पर यह नई नीति बनाई गई।
स्टालिन ने राजधानी चेन्नई के कट्टूरपुरम में इस नीति की घोषणा करते हुए कहा कि यह फैसला “राज्य की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को बचाने” के लिए लिया गया है। उन्होंने कहा कि शिक्षा नीति को राज्य सूची का विषय माना गया है और इस पर केंद्र का सीधा हस्तक्षेप अस्वीकार्य है।
हिंदी के प्रभुत्व पर तीखा हमला
स्टालिन ने अपने भाषण में हिंदी के बढ़ते प्रभाव को गंभीर खतरा बताया। उन्होंने कहा कि “उत्तर भारत में हिंदी के दबाव में कई क्षेत्रीय भाषाएँ समाप्त हो गई हैं” जैसे – भोजपुरी, मैथिली, अवधी, ब्रजबुली और बुंदेली। उन्होंने इसे एक सांस्कृतिक विलयन की प्रक्रिया बताया जो भारत की विविधता के खिलाफ है।
बांग्ला भाषा विवाद में भी स्टालिन का समर्थन
हाल ही में पश्चिम बंगाल में एक सरकारी आदेश में बांग्ला की जगह ‘बांग्लादेशी भाषा’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर उपजा विवाद भी चर्चा में रहा। इस मुद्दे पर स्टालिन ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ एकजुटता जताई और कहा कि “यह उस भाषा पर हमला है जिसमें हमारा राष्ट्रगान लिखा गया है।” उन्होंने ममता बनर्जी की तारीफ़ करते हुए कहा कि वह “गैर-हिंदी भाषाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एक ढाल बनकर खड़ी हैं।” यह बयान दक्षिण और पूर्वी राज्यों के बीच भाषाई एकजुटता की दिशा में एक अहम संकेत माना जा रहा है।
तमिलनाडु की नई शिक्षा नीति सिर्फ़ एक शैक्षणिक बदलाव नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सांस्कृतिक रुख है, जो केंद्र के कथित ‘हिंदी प्रभुत्व’ के खिलाफ स्पष्ट संदेश देता है। आने वाले समय में यह नीति अन्य गैर-हिंदी भाषी राज्यों के लिए भी एक नज़ीर बन सकती है।
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