FIFA World Cup controversy : फुटबॉल इतिहास का सबसे बड़ा विवाद, 1966 का वह ‘घोस्ट गोल’ और इंग्लैंड की धूमिल जीत

FIFA World Cup controversy : फीफा वर्ल्ड कप का रोमांच अब अपने मुहाने पर खड़ा है और फुटबॉल की पूरी दुनिया पिछले चार वर्षों से इस ऐतिहासिक खेल उत्सव का बेसब्री से इंतजार कर रही है। फुटबॉल इतिहास गवाह है कि जब भी मैदान पर गेंद रोल होना शुरू होती है, खेल के पुराने और दिलचस्प किस्से खुद-ब-खुद प्रशंसकों की जुबान पर तैरने लगते हैं। डिएगो माराडोना का वह कुख्यात ‘हैंड ऑफ गॉड’, फ्रांस के जिनेदिन जिदान का फाइनल में सिर से मारना (डाइव) हो या गॉर्डन बैंक्स का वह करिश्माई गोल बचाना (सेव)—ये सभी कहानियां हर कप के साथ दोबारा जीवित हो जाती हैं।

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लेकिन इन सबमें सबसे ऊपर और सबसे विवादास्पद किस्सा साल 1966 के वर्ल्ड कप फाइनल का ‘घोस्ट गोल’ (Ghost Goal) है। यह एक ऐसा ऐतिहासिक गोल है, जिसने फुटबॉल जगत को दो गुटों में बांट दिया और इस पर हो रही तीखी बहस आज छह दशक बीत जाने के बाद भी थमी नहीं है।

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1966 का वह ऐतिहासिक सफर और फाइनल का रोमांचक सफरनामा

साल 1966 के फुटबॉल विश्व कप की मेजबानी का जिम्मा इंग्लैंड के पास था। उस दौर में इंग्लिश टीम का डिफेंस और अटैकिंग फॉरवर्ड लाइन दोनों ही बेहद मजबूत स्थिति में थे। टूर्नामेंट की दो सबसे बड़ी और मजबूत दावेदार मानी जाने वाली टीमें—ब्राजील और अर्जेंटीना—जब शुरुआती दौर में ही अप्रत्याशित रूप से बाहर हो गईं, तो इंग्लैंड का रास्ता थोड़ा आसान हो गया।

हालांकि, सेमीफाइनल के मुकाबले में उनका सामना पुर्तगाल जैसी बेहद खतरनाक टीम से था, लेकिन बॉबी चार्लटन के शानदार दो गोलों (डबल) की बदौलत इंग्लैंड ने पुर्तगाल को शिकस्त दे दी। खेल के 82वें मिनट में पेनल्टी किक के जरिए गोल खाने के बावजूद स्टार गोलकीपर गॉर्डन बैंक्स ने अपनी टीम की जीत सुनिश्चित की। वहीं दूसरी तरफ, एक और कड़े सेमीफाइनल मुकाबले में वेस्ट जर्मनी ने सोवियत संघ को 2-1 से हराकर फाइनल का टिकट कटाया था।

वेम्बली स्टेडियम में खिताबी भिड़ंत और एक्स्ट्रा टाइम का महामुकाबला

30 जुलाई 1966 की वह तारीख फुटबॉल के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गई। लंदन के ऐतिहासिक वेम्बली स्टेडियम में इंग्लैंड और वेस्ट जर्मनी के बीच खिताबी मुकाबला खेला जा रहा था। इस महामुकाबले को देखने के लिए मैदान पर रिकॉर्ड 96,928 दर्शक मौजूद थे, यानी लगभग एक लाख उन्मादी प्रशंसकों के सामने दुनिया जीतने की यह ऐतिहासिक जंग शुरू हुई। मैच के 11वें मिनट में ही वेस्ट जर्मनी ने गोल कर शुरुआती बढ़त बना ली, लेकिन इंग्लैंड के स्टार स्ट्राइकर ज्योफ हर्स्ट ने जल्द ही बराबरी का गोल दाग दिया। 18वें मिनट तक स्कोर 1-1 की बराबरी पर था।

इसके बाद लंबे समय तक कोई गोल नहीं हुआ। 78वें मिनट में पीटर्स ने एक और गोल कर इंग्लैंड को 2-1 से आगे कर दिया। जब ब्रिटिश समर्थकों को लगने लगा कि खिताब उनके नाम हो चुका है, तभी मैच के आखिरी पलों में यानी 89वें मिनट में वेबर ने गोल कर वेस्ट जर्मनी को 2-2 की बराबरी पर ला खड़ा किया और मैच एक्स्ट्रा टाइम में खिंच गया।

101वें मिनट का वह पल जिसने जन्म दिया ‘घोस्ट गोल’ विवाद को

एक्स्ट्रा टाइम की शुरुआत के साथ ही इंग्लैंड ने अपना पूरा जोर लगा दिया। खेल के 101वें मिनट में जो कुछ हुआ, उसने अगले 60 सालों के लिए फुटबॉल में एक कभी न खत्म होने वाले विवाद को जन्म दे दिया। दरअसल, एलन बॉल के एक बेहतरीन क्रॉस को ज्योफ हर्स्ट ने अपने नियंत्रण में लिया और गोल पोस्ट की तरफ एक बेहद तेज शॉट दागा। गेंद गोल पोस्ट के ऊपरी क्रॉसबार से टकराकर सीधे नीचे जमीन पर गिरी और गोल लाइन के बेहद करीब उछलकर बाहर आ गई, जिसे जर्मन डिफेंडर ने तुरंत हेडर मारकर दूर धकेल दिया।

इंग्लैंड के खिलाड़ियों ने तुरंत इसे गोल करार देने की जोरदार अपील की। मुख्य रेफरी गॉटफ्रीड डिएनस्ट खुद इस फैसले को लेकर असमंजस में थे, लेकिन लाइन्समैन से लंबी बातचीत और सहमति के बाद उन्होंने सीटी बजाकर इसे इंग्लैंड के पक्ष में गोल घोषित कर दिया। इसी गोल की बदौलत इंग्लैंड 3-2 से आगे हो गया और अंत में हर्स्ट ने 120वें मिनट में एक और गोल कर अपनी ऐतिहासिक हैट्रिक पूरी की और इंग्लैंड को 4-2 से विश्व विजेता बना दिया।

धीमी गति के दृश्यों का सस्पेंस और रेफरी का अजीबोगरीब कबूलनामा

भले ही अंग्रेजों ने जीत का जश्न मनाया, लेकिन वेस्ट जर्मनी के खिलाड़ी इस फैसले से पूरी तरह असहमत थे और लगातार विरोध दर्ज करा रहे थे। आज भी इंटरनेट पर इस ‘घोस्ट गोल’ के अनगिनत वीडियो और क्लिप्स मौजूद हैं। अगर इस पूरे वाक्ये को बेहद धीमी गति (स्लो मोशन) में और आधुनिक तकनीक से देखा जाए, तो साफ प्रतीत होता है कि गेंद गोल लाइन के पूरी तरह अंदर नहीं गई थी, बल्कि लाइन के ऊपर या ठीक बाहर गिरी थी।

हालांकि, शत-प्रतिशत सटीकता से दावा करना आज भी असंभव है। इस ऐतिहासिक विवाद में नया मोड़ तब आया जब मुख्य रेफरी ने सालों बाद एक इंटरव्यू में कबूला कि वे खुद आश्वस्त नहीं थे, लेकिन इंग्लैंड के खिलाड़ी रोजर हंट के तुरंत जश्न मनाने के अंदाज को देखकर उन्हें लगा कि गेंद सच में गोल लाइन के पार चली गई थी।

क्वार्टर फाइनल में अर्जेंटीना के खिलाफ मैच में भी हुई थी बेईमानी?

इंग्लैंड की इस इकलौती विश्व कप जीत पर सिर्फ फाइनल के घोस्ट गोल का ही दाग नहीं है, बल्कि उसी टूर्नामेंट के क्वार्टर फाइनल में अर्जेंटीना के खिलाफ खेला गया मैच भी बेहद विवादास्पद रहा था। फुटबॉल पंडित मानते हैं कि इंग्लैंड और अर्जेंटीना के बीच जो कड़वाहट आज देखी जाती है, उसकी बुनियाद इसी मैच में रखी गई थी। इस मैच में इंग्लैंड ने 1-0 से जीत दर्ज की थी, लेकिन आरोप लगे कि ज्योफ हर्स्ट द्वारा 78वें मिनट में किया गया वह निर्णायक गोल पूरी तरह से ऑफसाइड था।

इसके अलावा, जर्मन रेफरी रुडोल्फ ने अर्जेंटीना के कप्तान एंटोनियो रैटिन को मैच के दौरान बेहद अजीब व्यवहार का हवाला देकर रेड कार्ड दिखा दिया, जिसके कारण अर्जेंटीना को पूरे मैच में सिर्फ 10 खिलाड़ियों के साथ खेलना पड़ा। यह विवाद इतना बढ़ा कि रैटिन ने गुस्से में मैदान से बाहर जाते समय कॉर्नर पर लगे इंग्लैंड के राष्ट्रीय ध्वज को ही फाड़ दिया था।

ब्रिटिश लायंस पर लगा ‘चोर’ का तमगा जो आज तक नहीं धुल सका

यह पूरा विवाद उस समय अपने चरम पर पहुंच गया जब मैच समाप्त होने के बाद इंग्लैंड टीम के तत्कालीन मैनेजर सर अल्फ रैमसे ने अपने खिलाड़ियों को अर्जेंटीना के खिलाड़ियों के साथ खेल भावना के तहत जर्सी बदलने से सख्त मना कर दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने सार्वजनिक रूप से दक्षिण अमेरिकी खिलाड़ियों को ‘जानवर’ तक कह डाला। इस नस्लीय और कड़े बयान ने विवाद की आग में घी का काम किया।

आज दशकों बीत जाने के बाद भी फुटबॉल की दुनिया इंग्लैंड की इस इकलौती विश्व कप जीत को पूरी तरह से साफ-सुथरी नहीं मानती है और उनके सिर पर खेल की दुनिया में ‘चोर’ होने का एक अदृश्य तमगा लगा हुआ है। ज्योफ हर्स्ट ने विश्व कप फाइनल में इकलौती हैट्रिक लगाने का जो रिकॉर्ड बनाया था, उसकी चमक भी इस घोस्ट गोल के विवाद के पीछे हमेशा के लिए फीकी पड़ गई।

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Chandan Das

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