Koodal Azhagar Temple : सनातन धर्म में पुरुषोत्तम मास यानी अधिक मास का विशेष महत्व माना गया है। भगवान श्रीहरि नारायण को समर्पित यह पावन महीना भक्ति, साधना और पुण्य कमाने के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र महीने में की गई पूजा-अर्चना और तीर्थ दर्शन का फल आम दिनों की तुलना में कई गुना अधिक प्राप्त होता है। इस विशेष महीने का समापन कल यानी 15 मई को सोमवती अमावस्या के पवित्र संयोग के साथ होने जा रहा है। पुरुषोत्तम मास के इस पावन विदाई वेला में आज हम आपको भगवान विष्णु के एक ऐसे प्राचीन और अद्भुत मंदिर की यात्रा पर ले जा रहे हैं, जिसकी महिमा और वास्तुकला सदियों से भक्तों को मंत्रमुग्ध करती आ रही है।

दक्षिण भारत की शान: मदुरै का दिव्य ‘कूडल अझगर’ मंदिर
दक्षिण भारत के सांस्कृतिक केंद्र तमिलनाडु के मदुरै शहर में स्थित भगवान विष्णु का यह भव्य मंदिर ‘कूडल अझगर’ के नाम से विश्व प्रसिद्ध है। यह पावन स्थल वैष्णव संप्रदाय के सबसे पवित्र 108 दिव्य देशमों (भगवान विष्णु के पवित्र निवास स्थान) में से एक माना जाता है। करीब 600 साल से भी अधिक प्राचीन इस मंदिर में भगवान नारायण ‘कूडल अझगर’ के दिव्य रूप में प्रतिष्ठित हैं। यहाँ वे एक अत्यंत सुंदर और विशाल सर्प शय्या (शेषनाग) पर शयन मुद्रा में विराजमान हैं। मंदिर की अलौकिक आभा और गर्भगृह का शांत वातावरण यहाँ आने वाले हर श्रद्धालु को एक अनोखी आत्मिक शांति का अनुभव कराता है।

वास्तुशिल्प का अनोखा चमत्कार: दोपहर में भी नहीं बनती शिखर की परछाई
कूडल अझगर मंदिर सिर्फ अपनी अगाध धार्मिक आस्था के लिए ही नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय वास्तुकला के बेजोड़ उदाहरण के लिए भी जाना जाता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी और विस्मयकारी विशेषता इसका ‘अष्टांग विमान’ यानी आठ हिस्सों वाला भव्य शिखर है। इस शिखर को इस गणितीय और वैज्ञानिक सटीकता से बनाया गया है कि कड़कती धूप और दोपहर के समय भी इसकी परछाई जमीन पर नहीं गिरती। प्राचीन काल का यह अद्भुत इंजीनियरिंग चमत्कार आज के आधुनिक वास्तुकारों, इंजीनियरों और यहाँ आने वाले हजारों पर्यटकों को हैरत में डाल देता है।
इतिहास के झरोखे से: पांड्य और विजयनगर राजाओं का अनमोल योगदान
इस ऐतिहासिक मंदिर का मूल निर्माण पांड्य राजवंश के राजाओं के शासनकाल के दौरान हुआ था। आगे चलकर दक्षिण भारत के वैभवशाली विजयनगर साम्राज्य और मदुरै के नायक शासकों ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया और इसकी भव्यता में चार चांद लगाए। पूरा मंदिर परिसर मजबूत ग्रेनाइट पत्थरों की ऊंची-ऊंची दीवारों से सुरक्षित रूप से घिरा हुआ है। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर एक भव्य पांच मंजिला ‘राजगोपुरम’ (प्रवेश द्वार का मुख्य शिखर) स्थित है। इस गोपुरम पर भगवान विष्णु के दशावतार, लक्ष्मी-नारायण, और लक्ष्मी-नरसिंह सहित कई देवी-देवताओं की अत्यंत सुंदर और सजीव नक्काशी उकेरी गई है। इसके साथ ही मंदिर परिसर में एक नवग्रह मंडप भी भक्तों के आकर्षण का केंद्र है।
देव स्वरूपों की संगति: श्रीराम, श्रीकृष्ण और प्राचीन तमिल शिलालेख
मुख्य गर्भगृह में कूडल अझगर रूप में विराजमान श्रीहरि के साथ ही उनकी अर्धांगिनी देवी मधुरवल्ली (माता लक्ष्मी) का भी एक अलग और भव्य मंदिर स्थापित है। इसके अलावा, विशाल मंदिर परिसर के भीतर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम, लीलाधर भगवान श्रीकृष्ण और अन्य प्रमुख देवी-देवताओं के छोटे-छोटे सुंदर उप-मंदिर भी बने हुए हैं। इस मंदिर की ऐतिहासिकता का सबसे बड़ा प्रमाण इसकी दीवारों पर खुदे प्राचीन तमिल शिलालेख हैं। इनमें प्राचीन तमिल साहित्य के महाकाव्य जैसे सिलप्पादिकारम, परिपादल और मदुरै कांची के अंश उत्कीर्ण हैं, जो इस स्थान की प्राचीनता और गौरवशाली अतीत को पूरी प्रामाणिकता के साथ बयां करते हैं।
पौराणिक गाथाएं: वेदों की रक्षा और अलवार संत की अनन्य भक्ति
कूडल अझगर मंदिर से कई बेहद रोचक और महत्वपूर्ण पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। ब्रह्मांड पुराण के अनुसार, जब सोमका नामक एक शक्तिशाली राक्षस ने ब्रह्माजी से चारों वेदों को चुरा लिया था, तब भगवान विष्णु ने कूडल अझगर का रूप धारण कर उस राक्षस का संहार किया और वेदों को सुरक्षित वापस लौटाया। एक अन्य वैष्णव कथा के अनुसार, बारह पूजनीय अलवार संतों में से एक पेरियालवार (विष्णुचित्त) ने पांड्य राजा के दरबार में भगवान की सर्वोच्चता और महिमा का गान किया था। उनकी इस निश्छल और परम भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान कूडल अझगर वहां साक्षात प्रकट हुए थे और उन्हें अपना दिव्य आशीर्वाद दिया था।
यात्रा का सुगम मार्ग: मदुरै जंक्शन से मात्र एक किलोमीटर की दूरी
यदि आप इस दिव्य और चमत्कारी मंदिर के दर्शन करने की योजना बना रहे हैं, तो यहाँ पहुँचना बेहद आसान और सुविधाजनक है। कूडल अझगर मंदिर मदुरै शहर के मुख्य केंद्र में ही स्थित है। मदुरै के मुख्य बस स्टैंड और मदुरै रेलवे जंक्शन से इस मंदिर की दूरी महज 1 किलोमीटर है, जहाँ से आप पैदल या रिक्शे से मिनटों में पहुँच सकते हैं। वहीं, यदि आप हवाई मार्ग से आ रहे हैं, तो मदुरै एयरपोर्ट से मंदिर की दूरी लगभग 14 किलोमीटर है। एयरपोर्ट से आपको मंदिर तक आने के लिए सीधे ऑटो, टैक्सी या स्थानीय बसें बेहद आसानी से मिल जाती हैं।
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