Jharkhand Politics : झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए हुए चुनाव के परिणाम ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। इस चुनाव में क्रॉस-वोटिंग के चलते भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवाणी ने जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस के आधिकारिक प्रत्याशी प्रणव झा को करारी हार का सामना करना पड़ा। झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के बैद्यनाथ राम अपनी सीट बचाने में सफल रहे। दो सीटों के लिए तीन उम्मीदवारों के बीच हुए इस कड़े मुकाबले में कांग्रेस की हार ने सत्तारूढ़ ‘महागठबंधन’ के भीतर चल रही अंदरूनी कलह को खुलकर सामने ला दिया है।

जेडीयू का हेमंत सोरेन को बड़ा ऑफर
चुनाव परिणामों के तुरंत बाद एनडीए खेमे से एक बड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है। जेडीयू विधायक सरयू राय ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को एक बड़ा राजनीतिक ऑफर देते हुए कांग्रेस को सरकार से बाहर करने की सलाह दी है। सरयू राय का कहना है कि अब महागठबंधन में दरारें स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही हैं और यह गठबंधन किसी भी समय बिखर सकता है। उन्होंने हेमंत सोरेन से अपील की है कि वे बीजेपी और कांग्रेस दोनों से दूरी बनाते हुए एक नई और स्वतंत्र सरकार का गठन करें। सरयू राय ने यह भी दावा किया कि एनडीए को पहले से ही इस बात का भरोसा था कि उनके समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी राज्यसभा पहुंचेंगे।

महागठबंधन में बढ़ती खटपट और कांग्रेस का दर्द
राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की शर्मनाक हार के बाद महागठबंधन में खटपट तेज हो गई है। झारखंड कांग्रेस के प्रभारी के. राजू ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि इस हार का सीधा असर राज्य के गठबंधन पर पड़ेगा। उन्होंने अपने सहयोगियों पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस उम्मीदवार को हार का सामना इसलिए करना पड़ा क्योंकि गठबंधन के ही कुछ साथियों ने उनके प्रत्याशी को वोट नहीं दिए। यह बयान स्पष्ट करता है कि कांग्रेस अपने सहयोगी दलों के प्रति काफी नाराज है और अब गठबंधन के भविष्य को लेकर पार्टी के भीतर गंभीर मंथन शुरू हो गया है।
संख्या बल का गणित: कांग्रेस क्यों हारी और एनडीए कैसे जीता?
झारखंड विधानसभा के 81 सदस्यीय सदन में एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए प्रथम वरीयता के 28 वोटों की आवश्यकता थी। महागठबंधन के पास कुल 56 विधायक थे, जिसके हिसाब से दो सीटें उनकी आसानी से निकल जानी चाहिए थीं। जेएमएम के बैद्यनाथ राम की जीत के बाद महागठबंधन के पास 28 वोट शेष थे, जो कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा को मिलने चाहिए थे। लेकिन, उन्हें केवल 20 वोट ही मिल सके। इसके विपरीत, एनडीए के पास केवल 24 विधायक थे, लेकिन निर्दलीय प्रत्याशी को 28 वोट मिले। मतगणना के दौरान तीन वोट रद्द होने, जिनमें भाजपा के दो और कांग्रेस का एक वोट शामिल था, ने इस चुनाव की प्रक्रिया को और भी विवादास्पद बना दिया है।
क्या बिखर जाएगा झारखंड में महागठबंधन का सियासी किला?
इस राज्यसभा चुनाव ने न केवल विपक्षी दल के मनोबल को बढ़ाया है, बल्कि राज्य सरकार के अस्तित्व पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। क्रॉस-वोटिंग की इस घटना ने कांग्रेस और जेएमएम के बीच भरोसे की कमी को उजागर कर दिया है। अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस बढ़ते दबाव के बीच महागठबंधन को कैसे बचाते हैं या क्या वे जेडीयू विधायक के सुझाव पर कोई बड़ा कदम उठाने वाले हैं। राज्य की राजनीति में आगामी कुछ दिन बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं, जो यह तय करेंगे कि झारखंड सरकार का स्वरूप क्या होगा।
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