PV Narasimha Rao : संन्यास छोड़ बने भारत के 9वें प्रधानमंत्री, 17 भाषाओं के विद्वान पीवी नरसिम्हा राव की कहानी

PV Narasimha Rao : 21 मई 1991 की रात भारत के इतिहास में एक काला अध्याय बनकर दर्ज है। तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक जनसभा के दौरान आत्मघाती हमले में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की नृशंस हत्या कर दी गई। एलटीटीई (LTTE) द्वारा प्रायोजित इस हमले में देश ने अपना एक युवा और लोकप्रिय नेता खो दिया। इस घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया और कांग्रेस के सामने नेतृत्व का भारी संकट खड़ा हो गया। उस समय दिल्ली में ‘9, मोतीलाल नेहरू मार्ग’ पर पीवी नरसिम्हा राव अपनी सक्रिय राजनीति को अलविदा कहकर हैदराबाद लौटने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने अपने घर की पैकिंग भी पूरी कर ली थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

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प्रधानमंत्री बनने की नाटकीय कहानी

राजीव गांधी के अंतिम संस्कार के बाद, सोनिया गांधी ने भावी नेतृत्व पर चर्चा के लिए के. नटवर सिंह और पीएन हक्सर से सलाह ली। हक्सर ने पहले उप-राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा का नाम प्रस्तावित किया, लेकिन अस्वस्थ होने के कारण उन्होंने जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया। इसके बाद, हक्सर और सतीश शर्मा ने पीवी नरसिम्हा राव के नाम पर मुहर लगाई। 10वीं लोकसभा के चुनाव नतीजों में कांग्रेस 232 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। हालांकि यह बहुमत से कम था, लेकिन राव के नाम पर सहमति बनी। शरद पवार के दौड़ से हटने के बाद, अर्जुन सिंह ने राव के नाम का प्रस्ताव रखा और 21 जून 1991 को नरसिम्हा राव ने भारत के नौवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।

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राव के कार्यकाल की शुरुआत और कैबिनेट का गठन

नरसिम्हा राव ने अपने मंत्रिमंडल में देश के कई दिग्गज नेताओं को शामिल किया। मनमोहन सिंह को वित्त मंत्रालय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई, जिससे देश ने ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों का दौर देखा। इसके अलावा, शरद पवार रक्षा मंत्री और अर्जुन सिंह मानव संसाधन विकास मंत्री बने। राव ने बाद में आंध्र प्रदेश की नांदयाल सीट से उपचुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज की। 28 जून 1921 को जन्मे नरसिम्हा राव का आज 105वां जन्मदिन है, जो उनके देश के प्रति योगदान को याद करने का अवसर है।

बहुभाषी विद्वान और साहित्यिक प्रतिभा

नरसिम्हा राव न केवल एक कुशल राजनीतिज्ञ थे, बल्कि वे असाधारण बौद्धिक क्षमता के धनी भी थे। उन्हें 17 भाषाओं का गहरा ज्ञान था। भारतीय भाषाओं के साथ-साथ, वे अरबी, फारसी, स्पेनिश और फ्रेंच जैसी विदेशी भाषाओं को न केवल धाराप्रवाह बोल सकते थे, बल्कि उनमें लेखन भी कर सकते थे। उनकी यह खूबी कूटनीति के स्तर पर बहुत काम आती थी, क्योंकि कई अंतरराष्ट्रीय बैठकों में उन्हें अनुवादक की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।

साहित्य के प्रति गहरा अनुराग

साहित्य के क्षेत्र में भी राव का योगदान अतुलनीय है। वे एक मर्मज्ञ अनुवादक थे। उन्होंने तेलुगु के कालजयी उपन्यास ‘वेई पदागालू’ का हिंदी में और मराठी उपन्यास ‘पन लक्षत कोन घेतो’ का तेलुगु में अनुवाद किया था। राजनीति की व्यस्तताओं के बावजूद, उनका लेखन और अनुवाद के प्रति प्रेम उनके व्यक्तित्व को एक बहुआयामी स्वरूप प्रदान करता था। वे एक ऐसे राजनेता थे जिनकी वैचारिक गहराई ने आधुनिक भारत की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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