Bilaspur Hospital : बिलासपुर के कोनी में 200 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से निर्मित मल्टी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल को लेकर राज्य की राजनीति गरमा गई है। इस अस्पताल के संचालन के लिए सरकार द्वारा अपनाए जा रहे पीपीपी (PPP – पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल के निर्णय ने कांग्रेस और भाजपा के बीच तीखी बहस छेड़ दी है।

कांग्रेस ने इस कदम को पूरी तरह से जनविरोधी करार दिया है और इसे निजी हाथों में सौंपने के फैसले के खिलाफ चरणबद्ध आंदोलन की चेतावनी दी है। वहीं, भाजपा ने कांग्रेस के इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित और आधारहीन बताया है, जिससे यह मुद्दा स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ अब एक प्रमुख राजनीतिक विवाद बन चुका है।

कांग्रेस का तर्क: निजीकरण से बढ़ेगा इलाज का खर्च
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विजय केशरवानी, शहर अध्यक्ष और ग्रामीण जिला अध्यक्षों ने संयुक्त रूप से मोर्चा खोलते हुए कहा है कि जिस अस्पताल का निर्माण पूरी तरह से सरकारी जमीन पर जनता के टैक्स के पैसे से हुआ है, उसे निजी संस्था को देने का कोई औचित्य नहीं है। उनका तर्क है कि अस्पताल की मशीनें और बुनियादी ढांचा पूरी तरह सरकारी है, फिर इसके प्रबंधन को निजी हाथों में सौंपने की क्या आवश्यकता है?
कांग्रेस का स्पष्ट मानना है कि पीपीपी मॉडल लागू होने से गरीब मरीजों के लिए मुफ्त इलाज की सुविधा प्रभावित होगी और चिकित्सा सेवाएं आम आदमी की पहुंच से दूर व महंगी हो जाएंगी। उन्होंने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि यह निर्णय वापस नहीं लिया गया, तो पार्टी सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करेगी।
उपमुख्यमंत्री और स्थानीय विधायक का पलटवार
विपक्ष के हमलों पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और बिलासपुर के प्रभारी मंत्री अरुण साव ने कांग्रेस के दावों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को अत्याधुनिक और बेहतर बनाने के लिए संकल्पित है। उन्होंने आश्वस्त किया कि अस्पताल में उपलब्ध मशीनें और सुविधाएं लोगों को बेहतर इलाज प्रदान करने के लिए हैं।
वहीं, स्थानीय विधायक सुशांत शुक्ला ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन लोगों ने वर्षों तक प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को लचर बनाया, उन्हें अब सवाल उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के लिए पूरी पारदर्शिता के साथ काम कर रही है।
क्या है पूरा मामला और विभाग की क्या है योजना?
विवाद की असली जड़ चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा 23 जून को जारी किया गया वह पत्र है, जिसमें कोनी स्थित 240 बिस्तर वाले सुपर स्पेशलिटी अस्पताल और 100 बिस्तर वाले कैंसर केयर अस्पताल का संचालन पीपीपी मॉडल पर कराने का निर्णय लिया गया है।
इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए सरकार ने केपीएमजी (KPMG) जैसी कंसल्टेंट कंपनी से संशोधित ‘रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल’ (RFP), लाइसेंस एग्रीमेंट और फाइनेंशियल मॉडल तैयार कराया है। वर्तमान में विभाग टेंडर प्रोसेसिंग कमेटी गठित करने की तैयारी में है। कांग्रेस इसी प्रक्रिया का पुरजोर विरोध कर रही है, क्योंकि उनका मानना है कि सरकार सरकारी संपत्ति को निजी क्षेत्र के हवाले कर जनता के हितों के साथ समझौता कर रही है।
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