Dhamaal 4 Review: हंसी का डबल डोज या फुस्स? जानिए कैसी है अजय-रितेश की फिल्म

Dhamaal 4 Review: कहते हैं कि हंसी सेहत के लिए सबसे अच्छी दवा है, और जब जीवन की भागदौड़ में काम का प्रेशर और तनाव हद से ज्यादा बढ़ जाए, तो ‘नो-लॉजिक, फुल एंटरटेनमेंट’ वाली फिल्में ही एकमात्र सहारा बनती हैं। इसी फॉर्मूले को एक बार फिर से पर्दे पर उतारने के लिए निर्देशक इंद्र कुमार अपनी बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘धमाल 4’ के साथ सिनेमाघरों में लौट आए हैं।

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सात साल के लंबे और बेसब्री भरे इंतजार के बाद, 10 जुलाई 2026 को यह फिल्म आखिरकार बड़े पर्दे पर रिलीज हो गई है। अगर सीधे शब्दों में कहें, तो यह फिल्म कोई गंभीर संदेश या समाज सुधारने का दावा नहीं करती, बल्कि इसका एकमात्र उद्देश्य अपने दर्शकों के वीकेंड को शानदार बनाना और उन्हें अपनी कल्ट कॉमिक टाइमिंग से गुदगुदाना है। क्या सात साल बाद भी आदि-मानव की वो निराली हरकतें दर्शकों को हंसा पाएंगी? आइए जानते हैं।

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खजाने की खोज और किरदारों का अतरंगी सफर: फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी सदियों पुराने एक अतरंगी इतिहास के इर्द-गिर्द बुनी गई है। करीब सौ साल पहले, ‘शैतान सिंह’ नामक एक खूंखार समुद्री डाकू ने एक अज्ञात आइलैंड पर अरबों का खजाना छुपाया था। इस रहस्यमयी खजाने तक पहुंचने का एकमात्र नक्शा आज के दौर में पृथ्वी देशपांडे (उपेंद्र लिमये) के पास है। यहीं से एंट्री होती है डाकू ‘अधूरा’ (रवि किशन) की, जो पृथ्वी से नक्शा चुराने में तो कामयाब हो जाता है, लेकिन अपनी फूटी किस्मत के चलते उसे नक्शे से हाथ धोना पड़ता है।

इसी खजाने की रेस में गुड्डू (अजय देवगन) की एंट्री होती है, जो पृथ्वी को बचाने के बहाने डाकू के जहाज तक तो पहुंच जाता है, लेकिन उसका असल मकसद भी खजाना ही है। इसके बाद कहानी में ऐसा भूचाल आता है कि गुड्डू और जॉनी (संजय मिश्रा) के साथ-साथ आदि-मानव (अरशद वारसी और जावेद जाफरी), रोजी (संजीदा शेख), और लल्लन-पारो (रितेश देशमुख और अंजली आनंद) भी इस जानलेवा लेकिन हंसी से लोटपोट कर देने वाली दौड़ में शामिल हो जाते हैं।

इंद्र कुमार का विजुअल स्टाइल: फर्स्ट हाफ का जबरदस्त एंटरटेनमेंट

इंद्र कुमार भली-भांति जानते हैं कि ‘धमाल’ के प्रशंसक उनसे क्या अपेक्षा रखते हैं। यही कारण है कि उन्होंने फिल्म के पहले हिस्से (फर्स्ट हाफ) को इतने तगड़े मनोरंजन, एक्शन और रोमांस के साथ पिरोया है कि दर्शक अपनी सीट से हिलने का मौका भी नहीं ढूंढ पाते। फिल्म में पुरानी बॉलीवुड फिल्मों के मजेदार मीम और मेटा रेफरेंसेस का बेहतरीन उपयोग किया गया है, जो आज के रील-फ्रेंडली जनरेशन को बेहद पसंद आएंगे। इसके अलावा, पुरानी यादों को ताजा करने के लिए कुछ पुराने सीन्स को बड़े ही इमोशनल तरीके से दिखाया गया है।

हालांकि, फिल्म का दूसरा हिस्सा (सेकंड हाफ) थोड़ा धीमा है। जब फिल्म क्लाइमेक्स की ओर बढ़ती है, तो रफ्तार थोड़ी कम जरूर होती है, लेकिन कॉमेडी फिल्म होने के नाते कुछ ओवर-द-टॉप सीन्स का होना लाजिमी है। अजय देवगन का टाइगर से भिड़ना हो या समुद्र के बीच ऑक्टोपस का निकल आना, ये चीजें तर्क से परे हैं लेकिन मनोरंजन के मामले में भरपूर हैं।

दमदार एक्टिंग और किरदारों का स्वैग

अभिनय के मोर्चे पर अरशद वारसी और जावेद जाफरी (आदि-मानव) इस फ्रेंचाइजी की जान हैं। उनकी जुगलबंदी आज भी उतनी ही ताजगी भरी लगती है जितनी बरसों पहले थी। उनके साथ संजीदा शेख का काम भी सराहनीय है। अजय देवगन और संजय मिश्रा (गुड्डू-जॉनी) की जोड़ी ने स्क्रीन पर एक गजब का रायता फैलाया है, जिसकी कॉमिक टाइमिंग कमाल की है। फिल्म में सबसे बेहतरीन किरदार रितेश देशमुख और अंजली आनंद (लल्लन-पारो) के हिस्से आए हैं। रितेश का लल्लन के किरदार में इमोशनल और कॉमिक बैलेंस अद्भुत है। वहीं, डाकू अधूरा के रोल में रवि किशन की एनर्जी ने फिल्म में एक नया तड़का लगा दिया है।

संगीत और तकनीकी पक्ष: क्या फिल्म है पैसा वसूल?

फिल्म का संगीत इसके माहौल के साथ पूरी तरह मेल खाता है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए मराठी गाने ‘गुलाबी साड़ी’ और भोजपुरी ‘चटनी’ के नए हिंदी वर्जन का इस्तेमाल दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर देता है। विशेषकर रितेश और अंजली पर फिल्माया गया गाना सिनेमाहॉल से बाहर आने के बाद भी दिमाग में गूंजता रहता है। हालांकि, फिल्म में डाले गए भूतिया एंगल को थोड़ा और बेहतर तरीके से फिल्माया जा सकता था, क्योंकि वह न तो डरा पाया और न ही बहुत हंसा पाया। क्लाइमेक्स के अंतिम 20 मिनटों में मेलोड्रामा की थोड़ी अधिकता है, जिसे थोड़ा कम किया जा सकता था।

क्या आपको यह फिल्म देखनी चाहिए?

अंत में यही कहा जा सकता है कि यदि आप ‘धमाल 4’ देखने का मन बना रहे हैं, तो अपने तर्क और दिमाग को घर पर ही छोड़ जाएं। यह फिल्म ऑस्कर के लिए नहीं बनी है, बल्कि इसका काम केवल आपके पूरे हफ्ते के तनाव को दूर करना है। आदि-मानव की जोड़ी और सितारों का स्वैग इस राइड को पूरी तरह ‘पैसा वसूल’ बनाता है। भले ही सेकंड हाफ थोड़ा खींचा हुआ लगे, लेकिन यह फिल्म आपको हंसाने का वादा पूरा करती है। तो देर किस बात की, अपने वीकेंड को खुशनुमा बनाने के लिए परिवार के साथ थिएटर का रुख करें और हंसी के इस महाडोज का आनंद लें!

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Chandan Das

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